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वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते पितरौ पश्य सुव्रत |
७२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ युध्यस्व तत्ते श्रेय़ो भविष्यति ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र शाधि किं करवाणि ते ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ विप्रर्षे गवा क्रीतोऽसि भार्गव |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तीर्य गङ्गां शोणं च सर्वे ते प्राङ्मुखास्त्रय़ः |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तीर्य च महीपालो वाष्पव्याकुललोचनः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तीर्य सलिलात्तस्माल्लोभनीय़तमाकृतिः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्तेजनी जय़त्सेना कमलाक्ष्यथ शोभना |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
उत्थातुकामापि सती व्यतिष्ठद्विपुलेन सा |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
उत्थानं चाप्यदैवस्य ह्यनुत्थानस्य दैवतम् |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
उत्थानं तु मनुष्याणां दक्षाणां दैववर्जितम् |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
उत्थानं ते विगर्हन्ति प्राज्ञानां तन्न रोचते ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
उत्थानं संय़मो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
उत्थानं हि नरेन्द्राणां वृहस्पतिरभाषत |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
उत्थानधीरं वाग्धीरा रमय़न्त उपासते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
उत्थानधीरः पुरुषो वाग्धीरानधितिष्ठति |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
उत्थानमभिजानन्ति सर्वभूतानि भारत |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
उत्थानमात्मनश्चैव धीरः कुर्वीत वा न वा ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
उत्थानवीर्यः सुखमेधमानो; दुर्योधनः सुकृतं मन्यते तत् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
उत्थानशीलो मित्राढ्यः स राजा राजसत्तमः ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
उत्थानस्य फलं सम्यक्तदा स लभतेऽचिरात् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
उत्थानहीनो राजा हि वुद्धिमानपि नित्यशः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
उत्थाने च सदा पुत्र प्रय़तेथा युधिष्ठिर |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
उत्थानेन जय़ेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चय़ाज्जय़ेत् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
उत्थानेन महेन्द्रेण श्रैष्ठ्यं प्राप्तं दिवीह च ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
उत्थानेनाप्रमादेन पूजय़ेच्चैव धार्मिकान् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
उत्थानेनामृतं लव्धमुत्थानेनासुरा हताः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
उत्थानय़ुक्तः सततं परेषामन्तरैषणे |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
उत्थापितो धृतश्चैव मा भैरिति च सान्त्वितः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाप्य चैनं शनकै राजानं पृथिवीतलात् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
उत्थाप्य भ्रातरं राजा धर्मराजो धनञ्जय़म् |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाप्य याज्ञसेनीं तु रुदतीं शोककर्शिताम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाप्य सम्परिष्वज्य प्रीत्याजिघ्रत मूर्धनि ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थापय़ामास तदा प्रभुरेकः प्रजापतिः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
उत्थापय़िष्ये यद्येनं ध्रुवं कोपं करिष्यति |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
उत्थाय़ काले कालज्ञः सह पाण्डव मन्त्रिभिः ||
७६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ च जलात्तस्मात्प्रतिलभ्य वपुः स्वकम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
उत्थाय़ चास्मि निष्क्रान्तो यदि मां त्वं महीपते |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
उत्थाय़ तस्माच्छय़नादुवाच; पार्थं ततो दुःखपरीतचेताः ||
१०१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ तस्मात्प्रातिष्ठद्भीष्मः सत्यपराक्रमः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ तु पुनर्धैर्यात्तदा मत्स्यपतेः सुता |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
उत्थाय़ तु महावाहुः क्रुद्धो नाग इव श्वसन् |
५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ तु महावाहुः पर्याश्वस्तो धनञ्जय़ः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ तु यथाकालमुत्तरा यदुनन्दनम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ प्रय़युर्वीराः कृष्णामादाय़ भारत ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
उत्थाय़ प्रय़यौ तूर्णं राजमध्यादमर्षितः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्थाय़ वाक्यं सावित्रीमव्रवीत्परिसान्त्वय़न् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
उत्थाय़ स गदापाणिर्युद्धाय़ समुपस्थितः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्थाय़ सत्यवांश्चापि प्रमृज्याङ्गानि पाणिना |
१०१ क