शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
उत्पथं प्रतिपत्स्यन्ते काममन्युसमीरिताः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
उत्पथं मन्यसे मार्गमनभिज्ञ इवाध्वगः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
उत्पथप्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
उत्पथप्रतिपन्नस्य दण्डो भवति शासनम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीय़ते ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
अर्जुन उवाच
उत्पथे हि वने जाता मृगव्यालनिषेविते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
उत्पथेऽस्मिन्महाराज मा च शोके मनः कृथाः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
उत्पद्यन्ते विचित्राणि तान्येषोऽप्यभिमन्यते |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
उत्पन्न एव भवति शरीरं चेष्टय़न्प्रभुः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
उत्पन्नः स जरत्कारुस्तपस्युग्रे रतो द्विजः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
उत्पन्नत्यागिनः सर्वे जना आसन्नमत्सराः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
उत्पन्नत्यागिनोऽलुव्धाः कृपासूय़ाविवर्जिताः |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससङ्ग्रहाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
उत्पन्नमिममात्मानं नरस्यानन्तरं ततः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
उत्पन्नमिह लोके वै जन्मप्रभृति मानवम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२००
युधिष्ठिर उवाच
उत्पन्नश्च कथं भेदः कथं चान्योन्यमघ्नताम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पन्नसंशय़ो राजा तमेव समचोदय़त् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भरद्वाज उवाच
उत्पन्नस्य रुरोः शृङ्गं वर्धमानस्य वर्धते |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
उत्पन्ना च भवे भक्तिरनन्या सर्वभावतः ||
१५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
व्राह्मण उवाच
उत्पन्ना मे मतिरिय़ं कुतो धर्ममय़ः प्लवः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पन्ना लोकसिद्ध्यर्थं व्रह्माणं समुपस्थिताः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
उत्पन्नानपरान्तेषु विनीतान्हस्तिशिक्षकैः ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
उत्पन्ने कारणे प्रीतिर्नास्ति नौ कारणान्तरे |
१४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
उत्पन्ने च पुरा हव्ये कुशिकर्षिः परन्तप |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
उत्पन्ने चापि विज्ञाने नाधिगच्छति तां गतिम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
शुक उवाच
उत्पन्ने ज्ञानविज्ञाने प्रत्यक्षे हृदि शाश्वते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
उत्पन्नेन हि जीवामो वय़ं नित्यं वनौकसः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
उत्पन्नेऽऽङ्गिरसे चैव युगे प्रथमकल्पिते |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
उत्पन्नौ वन्दिनौ चास्य तत्पूर्वौ सूतमागधौ ||
११८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
उत्पपात जवेनैव यन्त्रमुन्मथ्य वीर्यवान् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
उत्पपात ततो धारा विमला वारिणः शिवा |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
उत्पपात तदाकाशं समन्ताद्वैनतेय़वत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्पपात दिवं शुभ्रं कालेनाभिप्रचोदितः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
उत्पपात भृशं क्रुद्धः श्येनवन्निपपात ह ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
उत्पपात महावीर्यः पक्षिराट्परवीरहा ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्पपात महीं त्यक्त्वा भीतस्तस्मान्महात्मनः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
उत्पपात रथात्तूर्णं माय़ामास्थाय़ राक्षसीम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
उत्पपात रथात्तूर्णं श्येनवन्निपपात च ||
५८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पपाताथ वेगेन दण्डाहत इवोरगः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
उत्पपातान्तरिक्षं च जहास च सुविस्वरम् |
६४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पपाताश्रमात्तस्मादन्तरिक्षं विशां पते |
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्पपातासनात्क्रुद्धो दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पपातासनात्क्रुद्धो वधे तेषां समाहितः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पाट्य कदलीस्कन्धान्वहुतालसमुच्छ्रय़ान् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
उत्पाट्य च महाशाखैर्विविधैर्जगतीरुहैः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पाट्य जग्राह ततोऽम्वुजानि; सौगन्धिकान्युत्तमगन्धवन्ति ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पाट्य दोर्भ्यां द्रुममेकवीरो; निष्पत्रय़ामास यथा गजेन्द्रः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पातनादशव्देन सन्त्रासित इवाभवन् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
उत्पातमेघा रौद्राश्च रात्रौ वर्षन्ति शोणितम् ||
३० ख