आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
उत्पातमेघा रौद्राश्च ववर्षुः शोणितं वहु |
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पाता दारुणाश्चैव शुभाश्च जनमेजय़ |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
उत्पाता युधि वीराणां जीवितक्षय़कारकाः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पाता विविधा वीर दृश्यन्ते क्षत्रनाशनाः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
उत्पातान्दारुणान्पश्यन्नित्युवाच वृहस्पतिम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
उत्पाताश्च निपाताश्च सुय़ुद्धं सुपलाय़नम् |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
उत्पाताश्चात्र दृश्यन्ते वहवो राजनाशनाः ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
उत्पातेषु च सर्वेषु दैवज्ञः कुशलस्तव ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
उत्पादने तथोपाय़मनुजग्मुश्च मानवाः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
उत्पादितान्यपत्यानि व्राह्मणैर्निय़तात्मभिः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
उत्पाद्य च वहून्पुत्रान्कुलसन्तानकारिणः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
उत्पाद्य तु महाभागस्तासामवरजा दश |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
उत्पाद्य पुत्रं हि पिता कृतकृत्यो भवत्युत ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
उत्पाद्य पुत्रपौत्रं तु वन्याश्रमपदे वसेत् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
उत्पाद्य पुत्राननृणांश्च कृत्वा; वृत्तिं च तेभ्योऽनुविधाय़ काञ्चित् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
उत्पाद्य पुत्रान्मुनय़ो नृपते यत्र तत्र ह |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
९७
लोपामुद्रो उवाच
उत्पादय़ सकृन्मह्यमपत्यं वीर्यवत्तरम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
उत्पादय़ति यो विघ्नं तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्चैरावतश्च ह ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पेतुः खमुपादाय़ धृतराष्ट्रसुतांस्ततः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पेतुः शरजालानि घोररूपाणि सर्वशः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
उत्पेतुः सहसा राजन्हंसा इव महोदधौ ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पेतुः सहसा सर्वे कृपः स्थानादथाच्यवत् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पेतुर्नादमतुलमुत्सृजन्तो रणार्थिणः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पेतुर्भैरवान्नादान्विनदन्तो दिशो दश ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
उत्पेतुस्तेन शव्देन योधा राजन्विचेतसः |
८२ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पेदिरे महावाता दारुणाश्चा दिने दिने |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
उत्फाल्य विपुले नेत्रे ततस्तामिदमव्रवीत् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्फुल्लनय़नो वालः कलमव्यक्तमव्रवीत् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सङ्ग इव संवृद्धं द्रुपदस्यास्त्रवित्तमम् |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भः परो युवा ||
८१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
उत्सङ्गे धनुरादाय़ सशरं रथिनां वरः ||
६२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
उत्सङ्गे पातय़स्वाशु वृद्धक्षत्रस्य भारत ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
उत्सङ्गे वक्त्रमाधाय़ जीवन्तमिव पृच्छति |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्सङ्गे शिर आरोप्य भूमावुपविवेश ह ||
६१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
उत्सङ्गेन व्याल इवाहृतोऽसि; मार्जारवत्पोषकं चोपहंसि |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्सङ्गेऽस्य शिरः कृत्वा निषसाद महीतले ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
उत्सङ्गेऽस्याः शिरः कृत्वा सुष्वाप परिखिन्नवत् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
उत्सन्नकृषिगोरक्ष्या निवृत्तविपणापणा |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
उत्सन्नपिण्डो भ्राता च नैतन्न्याय़्यं कृतं त्वय़ा ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
उत्सन्नपितृदेवेज्यास्ते वै निरय़गामिनः ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
उत्सन्नोत्सवय़ज्ञा च वभूव वसुधा तदा ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
उत्सर्गे संशय़ः स्यात्तु विन्देतापि सुखं क्वचित् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सर्गेणापवादेन ऋषिभिः कपिलादिभिः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
उत्सर्गेऽमन्यत श्रेय़ो दमय़न्त्या नराधिपः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सवं कारय़िष्यन्ति सदा शक्रस्य ये नराः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
उत्सवादुत्सवं यान्ति स्वर्गात्स्वर्गं सुखात्सुखम् |
४ क