द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य कर्णं भीमं च प्राद्रवन्सर्वतोदिशम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य कवचानन्ये प्राद्रवंस्तावका विभो ||
८४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य काले राजेन्द्र निर्मोकमिव पन्नगः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
उत्सृज्य गाः सुसन्त्रस्तं वलं ते समशीर्यत ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य च महावाहुर्द्रोणपुत्रं धनञ्जय़ः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य च रणे शस्त्रं रथोपस्थे निवेश्य च |
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य चापानि दुरासदानि; सर्वे तदा शान्तिपरा वभूवुः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
उत्सृज्य चैव तं गर्भं नद्यास्तीरे जगाम ह |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
उत्सृज्य तान्सौवलमेव चाय़ं; समाह्वय़त्तेन जितोऽक्षवत्याम् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य तु शुभं देहं जगामेन्द्रस्य भार्यताम् |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य तुरगान्केचिद्रथान्केचिच्च मारिष |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य ते गदाशूलानसिशक्तिपरश्वधान् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
उत्सृज्य दमय़न्तीं तु नलो राजा विशां पते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
उत्सृज्य नास्तिकगतिं गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रिताः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
उत्सृज्य फलपत्राणि पादपः शोषमागतः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य रजतप्रख्यान्हय़ान्पार्थस्य मारिष |
५३ क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य रथवंशं तु प्रय़ाते श्वेतवाहने |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य राजानमनन्तवीर्यो; जय़द्रथादींश्च नृपान्महौजाः |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य राज्यं भैक्षार्थं कृतवुद्धिं जनेश्वरम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
उत्सृज्य वरय़ेदन्यं यथा त्वं भीरु कर्हिचित् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
उत्सृज्य वाष्पं शनकै राजमातेदमव्रवीत् ||
११ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य वाहान्समरे चोदय़न्तस्तथापरे |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
उत्सृज्य विनिवर्तन्ते ज्ञातय़ः सुहृदः सुताः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रिय़ां प्रिय़ ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रिय़ां प्रिय़ ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
उत्सृज्य शतमाचार्यान्पृष्ठतोऽनुजगाम तम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य शतशो वाहांस्तत्र केचिन्नराधिपाः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य समरे तूर्णं पाण्डवं सव्यसाचिनम् |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य समरे द्रोणं व्यात्ताननमिवान्तकम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
उत्सृज्य सर्वगात्रेभ्यो भूषणानि महाय़शाः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य सर्वे परमाय़ुधानि; गृह्णीत हस्तैर्ज्वलितान्प्रदीपान् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
उत्सृज्य सहसा पुत्रौ केशिनीमिदमव्रवीत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य सात्यकिं क्रोधाद्गर्हय़ामास पाण्डवम् ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
उत्सृज्य सुमहद्दीप्तं वनवासमरोचय़त् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
पितर ऊचुः
उत्सृज्य सुमहद्राज्यं सूक्ष्मं प्रति महामते ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य सुमहार्हाणि शय़नानि नराधिप ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य हि महावाहुं भीमसेनं तदा रणे |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
अर्जुन उवाच
उत्सृज्यतां चित्रसेन भ्रातास्माकं सुय़ोधनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
उत्सृज्यापि घृणां काले यथा वर्तेत भूमिपः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
उत्सृज्यापि च मामार्य वेत्स्यस्यन्यामपि स्त्रिय़म् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्याभरणं तूर्णमवप्लुत्य रणाजिरे ||
५५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्याभरणान्यङ्गाज्जगृहे वल्कलान्युत ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
रुद्र उवाच
उत्सृज्येमं गिरिवरमेकाकी प्राप्तवानसि ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
उत्सृज्येह प्रय़ाता वै वान्धवा भृशदुःखिताः ||
५४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
अर्जुन उवाच
उत्सृज्यैतद्रथानीकं गच्छ यत्र सुय़ोधनः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्योत्सृज्य गच्छन्ति त्वरिता जीवितेप्सवः ||
१६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्योत्सृज्य समिय़ुस्त्वरय़न्तो हय़द्विपान् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृष्टं व्राह्मणैर्यज्ञे मरुत्तस्य महीपतेः |
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृष्टः शास्त्रविधिना व्यासेनामिततेजसा ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थय़न्ति यथा खगाः |
१२ क