उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
उक्तवानसि मां पूर्वमृतां तां कुरु वै गिरम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
उक्तवानसि यद्वीर मत्सकाशे पुरा वचः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य तु परां गतिम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवानस्मि दुर्वुद्धिं मन्दं दुर्योधनं पुरा |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवानस्मि यद्वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
उक्तवानस्मि यां क्रोधात्प्रतिज्ञां पितरस्तदा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति यद्वचः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः ||
६२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवानेष मां पूर्वं धर्मात्मा दिव्यदर्शनः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवान्देवकीपुत्रः कुन्त्याश्च विदुरस्य च |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
उक्तवान्न गृहीतं च मय़ा पुत्रहितेप्सय़ा ||
३६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवान्नृपतीनां त्वं महेन्द्रस्य सलोकताम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवान्वचनं तथ्यं हितं चैव विशेषतः |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तवान्वाय़ुराकाशे कुन्ती शुश्राव चास्य ताम् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
उक्तवान्हि भवान्सर्वं वचनं कुरुमुख्ययोः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तश्च जातो मर्त्येषु पुनर्लोकानवाप्स्यसि ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
उक्तश्च त्रिपुरघ्नेन परितुष्टेन भारत ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
उक्तश्च देवदेवेन प्रीतिय़ुक्तेन शूलिना |
१५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
उक्तश्च मानुषेण त्वं पथा गच्छेत्यविस्मितः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
उक्तस्तैरस्मि गच्छ त्वं व्रह्मलोकमिति प्रभो ||
३९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
उक्तस्त्रय़ाणां वर्णानां यज्ञस्त्रय़्यैव भारत |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तस्त्वेवं तय़ा राजा यमाविदमथाव्रवीत् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
उक्तस्त्वेवं भार्यया वै कहोडो; वित्तस्यार्थे जनकमथाभ्यगच्छत् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
उक्तस्त्वेवं विभुना देवराजः; प्रवेपमानो भृशमेवाभिषङ्गात् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
उक्तस्त्वय़ा महाभाग विस्तरं व्रूहि तत्त्वतः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तस्योक्तस्य नेहान्तमहं समुपलक्षय़े |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
उक्ता कामान्प्रय़च्छेति सा कामान्दुदुहे ततः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
उक्ता जनपदा येषु धर्मश्चैकः प्रदृश्यते ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
उक्ता द्वीपा महाराज ग्रहान्मे शृणु तत्त्वतः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
उक्ता धर्मा ये पुराणे महान्तो; व्राह्मणानां क्षत्रिय़ाणां विशां च |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
उक्ता सकृद्द्वन्द्वमेषा लेभे तेनास्मि वञ्चिता |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
उक्ता ह्यनेन पाञ्चाली सभाय़ां द्यूतनिर्जिता |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
उक्ताः पितामहेनेह सुवर्णस्य विधानतः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
उक्ताः स्मो यद्भगवता तदात्वाय़तिसंहितम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
उक्तानि कर्माणि वहूनि राज; न्स्वर्ग्याणि राजन्यपराय़णानि |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
उक्तानि यानि चान्यानि यानि चेष्टानि तस्य ह |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
नाग उवाच
उक्तानुक्ते कृते कार्ये मामामन्त्र्य द्विजर्षभ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
उक्तान्येतानि कर्माणि यानि कुर्वन्न दुष्यति |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
उक्तान्येतानि कर्माणि विस्तरेणेतरेण च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
उक्ताश्च देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
उक्ताश्च न विवक्षन्ति वक्तारमहिते रतम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
उक्तास्ते राजधर्माश्च आपद्धर्माश्च भारत |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
उमो उवाच
उक्तास्त्वय़ा पृथग्धर्माश्चातुर्वर्ण्यहिताः शुभाः |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तास्यष्टादशाहानि पुत्रेण जय़मिच्छता |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
लोमश उवाच
उक्ते वाक्ये चोत्तरं मे व्रवीहि; वाक्यस्य चाप्युत्तरं ते व्रवीमि ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
उक्तो द्वीपस्य सङ्क्षेपो विस्तरं व्रूहि सञ्जय़ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
युधिष्ठिर उवाच
उक्तो मन्त्रो महावाहो न विश्वासोऽस्ति शत्रुषु |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
उक्तो मार्गस्त्रय़ाणां च तत्तथैव समाचर |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तो मय़ा वासुदेवः पुनः पुनरुपह्वरे |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
उक्तो यश्चापि दण्डोऽसौ भर्तृप्रत्ययलक्षणः |
५० क