chevron_left  उदवासकृतारम्भोarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
उदवासकृतारम्भो वभूव सुमहाव्रतः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
उदस्तशस्त्राः कुरवो भीममभ्यद्रवन्रणे ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
उदात्तकुलजातीय़ उदात्ताभिजनः सदा |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
उदात्तानां कर्म तन्त्रं दैवं क्लीवा उपासते ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
उदान इति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
उदान इति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
उदान न त्वं श्रेष्ठोऽसि व्यान एव वशे तव ||
२१ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
उदानभूता च विसृज्य देहं; व्यानेन सर्वं दिवमावृणोति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
उदानस्तस्य पुत्रोऽभूद्व्यानस्तस्याभवत्सुतः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
उदानादुच्छ्वसिति च प्रतिभेदाच्च भाषते |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
उदाने सम्भृतो वाय़ुः समानः सम्प्रवर्तते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
उदारं प्रतिपद्यस्व नावरे स्थातुमर्हसि ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
उदारं यद्भवानाह नैतच्चित्रं भवद्विधे |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
उदारमेव विद्वांसो धर्मं प्राहुर्मनीषिणः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
उदारसत्त्वं सत्त्वज्ञाः सर्वाः पर्यचरंस्तदा ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
उदारसत्त्वाभिजनो भूमौ राजा कृताञ्जलिः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
उदारसारा महती रुरुसङ्घोपमा चमूः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
जनमेजय़ उवाच
उदाराश्चापि वंशेऽस्मिन्राजानो मे परिश्रुताः ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
उदासीनगुणानां च मध्यमानां तथैव च ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
उदासीनारिमित्राणां सर्वमेव चिकीर्षितम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १४२
भीम उवाच
उदासीनो निरीक्षस्व न कार्यः सम्भ्रमस्त्वय़ा |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
उदाहरणमेतद्धि यज्ञभागं च लप्स्यसे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
उदाहृतं ते राजेन्द्र यथा विष्णुं महौजसम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
उदाहृतं ते वचनं यदङ्गने; शुभे न तादृक्त्वदृते मय़ा श्रुतम् |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
उदाहृतः सर्वथा ते गुणानां; मय़ैकदेशः प्रसमीक्ष्य वुद्ध्या |
९६ क
विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
उदितस्येव सूर्यस्य तेजसोऽनु गभस्तय़ः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
उदितास्तमितो यश्च तथैवास्तमितोदितः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
उदिते तु सहस्रांशौ तप्तकाञ्चनसप्रभे |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
उदितेऽनुदिते वापि श्रद्दधानो जितेन्द्रिय़ः |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
उदितेऽभ्युत्थितः सूर्ये कौरव्यस्य निवेशनात् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
उदीक्षते महात्मानं भानुमन्तमिव प्रजाः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
उदीक्षन्तौ स्थितौ वीरौ वृत्रशक्राविवाहवे ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
उदीक्षमाणः पृतनां जय़ामि युधि वासव ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
उदीक्षितुं न शक्तोऽहं भविता न च तत्तथा ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
उदीक्ष्य च दिशः सर्वाः क्षत्तारं वाक्यमव्रवीत् ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
उदीचीं दक्षिणां प्राचीं प्रतीचीं प्रसृतस्तथा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
उदीचीं दिशमाश्रित्य रुचिरे सन्ददर्श ह ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
उदीचीं दीपय़न्नेष दिशं तिष्ठति कीर्तिमान् |
१२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
उदीचीं पुनरावृत्त्य यय़ुर्भरतसत्तमाः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
उदीचीं भगवान्सोमो व्रह्मण्यो व्राह्मणैः सह ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
उदीचीं भजते काष्ठां दिशमेष विभावसुः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
उदीचीमर्जुनो वीरः प्रतीचीं नकुलस्तथा ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
उदीच्यभोजाश्च तथा कुलान्यष्टादशाभिभो |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
उदीच्या दाक्षिणात्याश्च ये चान्येऽपि महारथाः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
उदीच्या निहताः सर्वे प्रतीच्याश्च नराधिप |
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
उदीच्यां चैनमालोक्य दक्षिणस्यां पुनः प्रभो |
२४ क