अनुशासन पर्व
अध्याय
१३
भीष्म उवाच
कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
कर्मणां फलमस्तीति धीरोऽल्पेनापि तुष्यति ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
युधिष्ठिर उवाच
कर्मणां मे समस्तानां शुभानां भरतर्षभ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
कर्मणां विषय़ं कृत्स्नमहं वक्ष्यामि तच्छृणु ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
९८
युधिष्ठिर उवाच
कर्मणां विस्तरं श्रोतुमगस्त्यस्य द्विजोत्तम ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मणानेन भीमस्य मम तुष्टिरभूत्पुरा ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
कर्मणामनुसन्तानं तेजसश्च गतिः शुभा ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
कर्मणामविभागज्ञः प्रेत्य चेह च नश्यति ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
शुक उवाच
कर्मणामविरोधेन कथमेतत्प्रवर्तते ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
कर्मणामानुपूर्वीं च विधिपूर्वकृतं शृणु |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
कर्मणामी भान्ति देवाः परत्र; कर्मणैवेह प्लवते मातरिश्वा |
८ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
कर्मणामुत पुण्यानां पापानां च फलोदय़ः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
कर्मणासौ वभौ भार्या स वह्निः स प्रजापतिः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
कर्मणाहुः सिद्धिमेके परत्र; हित्वा कर्म विद्यया सिद्धिमेके |
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मणैतेन राजेन्द्र धर्मश्च सुमहान्कृतः ||
३६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय़ः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
कर्मणो विवरं कुर्वन्न लोकानाप्नुय़ाच्छुभान् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
कर्मणो ह्यपि वोद्धव्यं वोद्धव्यं च विकर्मणः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मणोरिव वैफल्यमुभय़ोः पुण्यपापय़ोः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मण्यवसिते तस्मिन्सा तेनैव सहावसत् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
कर्मण्यसुकरे सक्तं जघानेति मतिर्मम ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मण्यस्मिन्नसंसिद्धे चापलादपरीक्षिते ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
कर्मण्यस्मिन्महाभाग सूक्ष्मं ह्येतदतीन्द्रिय़म् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
कर्मतः शीलतो वापि स तच्छ्रावय़ते युधि ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
कर्मतोऽन्यानि गोत्राणि समुत्पन्नानि पार्थिव |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
काल उवाच
कर्मदाय़ादवाँल्लोकः कर्मसम्वन्धलक्षणः |
६६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
कर्मदृष्ट्याथ भृत्यांस्त्वं वरय़ेथाः कुरूद्वह |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
कर्मदोषश्च वै विद्वन्नात्मजातिकृतेन वै |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
कर्मदोषेण विषमां गतिमाप्नोति दारुणाम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
कर्मनिर्वेदमुक्त्वा च सर्वनिर्वेदमव्रवीत् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कर्मनिष्ठां तथैवान्ये यतय़ः सूक्ष्मदर्शिनः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मनिष्ठांस्तु वुध्येथास्तपोनिष्ठांश्च भारत |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
कर्मन्यासकृतानां च विरक्तानां ततस्ततः |
६२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मन्यासमहं मन्ये त्वमपि द्रष्टुमर्हसि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
कर्मभिः परिपश्यन्ति शास्त्रोक्तैः शास्त्रचेतसः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
कर्मभिः पार्थ नानात्वं लोकानां यान्ति मानवाः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
कर्मभिः शुचिभिर्देवि शुद्धात्मा विजितेन्द्रिय़ः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
कर्मभिः श्रुतसम्पन्नः सद्भिराचरितैः शुभैः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
कर्मभिः सज्जनाचीर्णैर्विज्ञेय़ा योनिशुद्धता ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मभिः स्वकृतैः सा तु दुर्भगा समपद्यत |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
कर्मभिः स्वैरुपचितो जज्वाल परय़ा श्रिय़ा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
युधिष्ठिर उवाच
कर्मभिर्देवकल्पानां कीर्त्यमानैर्भृशं रमे ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
कर्मभिर्भीमसेनस्य सदृशो भीमकर्मणः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
कर्मभिर्वहुभिः ख्यातान्नानात्वं व्राह्मणेष्विह ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
कर्मभिश्चापि सुशुभैः सुव्रता ऋषय़स्तथा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
कर्मभिस्ते निरानन्दा धर्मनित्या जितेन्द्रिय़ाः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
कर्मभूमिमिमां प्राप्य पुनर्यान्ति सुरालय़म् ||
३१ ग