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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
शीलेन हि त्रय़ो लोकाः शक्या जेतुं न संशय़ः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
श्रीरु उवाच
शीलेन हि त्वय़ा लोकाः सर्वे धर्मज्ञ निर्जिताः |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
शुक भोः पक्षिणां श्रेष्ठ दाक्षेय़ी सुप्रजास्त्वय़ा |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
शुकं प्रोवाच धर्मज्ञमानृशंस्येन तोषितः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
भीष्म उवाच
शुकं स्वाध्याय़निरतं वेदार्थान्वक्तुमीप्सितान् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
शुकः प्रदक्षिणीकृत्य कृष्णमापृष्टवान्मुनिः ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
शुकः सर्वगतो भूत्वा सर्वात्मा सर्वतोमुखः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
शुकपत्रवर्णः किञ्चिच्च किञ्चित्स्फटिकसप्रभः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
शुकवाय़सरूपी च हंसकोकिलरूपवान् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
शुकशारिकसङ्घुष्टः फलवान्पुष्पवानपि ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
शुकश्च कर्मणा तेन आनृशंस्यकृतेन ह |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
शुकस्तु मारुतादूर्ध्वं गतिं कृत्वान्तरिक्षगाम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
शुकस्य दृढभक्तित्वाच्छ्रीमत्त्वं चाप स द्रुमः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
शुकस्य वचनं श्रुत्वा दिशः सवनकाननाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
शुकस्याग्र्यां गतिं चैव दुर्विदामकृतात्मभिः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
शुकस्यैतद्वचः श्रुत्वा व्यासः परमविस्मितः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
शुकानामपि सर्वेषां हिक्किका प्रोच्यते ज्वरः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
शुकी भूत्वा महाराज घृताची समुपागमत् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
शुकी विजज्ञे धर्मज्ञ शुकानेव मनस्विनी |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवाः समुपाद्रवन् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
शुकेन सह पुत्रेण वेदाभ्यासमथाकरोत् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
शुको गतः परित्यज्य पितरं मोक्षदेशिकम् ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
शुको जनकराजेन संवादं प्रीतमानसः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
शुको ददर्श धर्मात्मा पुष्पितद्रुमकाननाम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
शुको वारितमात्रस्तु कौतूहलसमन्वितः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
शुकोदरसमप्रख्यान्हय़ानष्टौ समानय़त् |
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
शुक्तान्यम्लानि तिक्तानि कषाय़कटुकानि च |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
शुक्तिमतीमरण्यां च पुष्पवेण्युत्पलावतीम् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
युधिष्ठिर उवाच
शुक्रं क्षेत्रं प्रमाणं वा यत्र लक्ष्येत भारत ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
शुक्रं निर्मथ्यते तद्वद्देहसङ्कल्पजैः खजैः ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
शुक्रं विश्वसृजं व्रह्म व्रह्मचारिणमेव च |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
शुक्रं वय़न्तौ तरसा सुवेमा; वभि व्ययन्तावसितं विवस्वत् ||
६१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
शुक्रं शोणितसंसृष्टं स्त्रिय़ा गर्भाशय़ं गतम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
शुक्रं सङ्कल्पजं नॄणां सर्वगात्रैर्विमुञ्चति ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
शुक्रः प्रोष्ठपदे पूर्वे समारुह्य विशां पते |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
शुक्रतो रसतश्चैव स्नेहाज्जाय़न्ति जन्तवः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
शुक्रनारदवाल्मीका मरुतः कुशिको भृगुः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य सः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
शुक्रमन्यत्र सम्भूतं पुनरन्यत्र गच्छति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
शुक्रमस्पर्शजं देहात्सृजन्त्यस्य मनोवहा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
शुक्रशोणितसङ्घाते मज्जास्नाय़ुपरिग्रहे |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
मनुरु उवाच
शुक्रस्य च वलेश्चैव संवादं वै समागमे ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६९
धृतराष्ट्र उवाच
शुक्रस्य धातारमजं जनित्रं; परं परेभ्यः शरणं प्रपद्ये ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
शुक्रस्य पुनराजातिरपध्यानादधर्मवित् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
शुक्राच्च तात सम्भूतिर्मांसस्येह न संशय़ः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
शुक्राच्छोणितसंसृष्टात्पूर्वं प्राणः प्रवर्तते |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
शुक्राद्व्रह्म प्रभवति व्रह्म शुक्रेण वर्धते |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाङ्नो भविष्यसि ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
शुक्रे निर्मथ्यमाने तु शुको जज्ञे महातपाः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
शुक्रे हुतेऽग्नौ तस्मिंस्तु प्रादुरासंस्त्रय़ः प्रभो ||
१४ ख