chevron_left  जातूकर्णःarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
जातूकर्णः शिखावांश्च सुवलः पारिजातकः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
जाते दुर्योधने क्षत्ता महामतिरभाषत |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
जाते पुत्रे वनमेवाव्रजेथा; राज्ञः प्रिय़ाण्यस्य सर्वाणि कृत्वा ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
जाते वृकोदरे पाण्डुरिदं भूय़ोऽन्वचिन्तय़त् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
जातैरिह महीपाल जाय़मानैश्च तैर्मही |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
जातो जातश्च वलवान्भुङ्क्ते चात्मा स देहवान् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
जातो दानपतिः पुत्रस्त्वय़ा शूरस्तथापरः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
जातो नः संशय़ो धर्मे मांसस्य परिवर्जने |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
जातो नृप सुतस्तेऽय़ं वालभास्करसंनिभः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय ३९
अर्जुन उवाच
जातो हिमवतः पृष्ठे तेन मां फल्गुनं विदुः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
जातोऽसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
जातोऽसि भारते वंशे सर्वपार्थिवपूजिते |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
जातौ गुणविशिष्टाय़ां समावर्तेत वेदवित् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
जातौ वाल्येऽथ कौमारे यौवने चापि मानवः |
११ क
वन पर्व
अध्याय २७६
मार्कण्डेय़ उवाच
जात्यन्तरगता राजन्नेतद्वुद्ध्यानुचिन्तय़ ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
जात्यन्ध इव पन्थानमावृतात्मा न वुध्यते ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
उमो उवाच
जात्यन्धाश्चापरे देव रोगार्ताश्चापरे तथा |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
जात्यन्धैरिह तुल्यास्ते मृतैः पङ्गुभिरेव च |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
जात्या च कर्मणा चैव दुष्टं कर्म निषेवते |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
जात्या च सदृशाः सर्वे कुलेन सदृशास्तथा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
जात्या दुष्टश्च यः पापं न करोति स पूरुषः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
जात्या प्रधानं पुरुषं कुर्वाणं कर्म धिक्कृतम् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
युधिष्ठिर उवाच
जात्यावरस्य राजर्षे दोषस्तस्य भवेन्न वा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
जात्यैवैके सुखतराः सन्त्यन्ये भृशदुःखिताः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
जानंश्च शकुनेर्माय़ां पार्थो द्यूतमिय़ात्पुनः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
कण्व उवाच
जानंश्चकार व्याख्यानं यन्तुः सर्वमशेषतः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
अर्जुन उवाच
जानंस्त्वमपि वै कृष्ण मां विमोहय़से कथम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
जानकिर्नाम राजर्षिः स वभूव नराधिपः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
जानकिश्च सुशर्मा च मणिमान्पौतिमत्स्यकः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
जानञ्जय़ं निय़तं वृष्णिवीरे; धनञ्जय़े चाङ्गिरसां वरिष्ठः ||
६९ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
जानतस्त्वेव ते सर्वं किञ्चिद्वक्ष्यामि भारत ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १७३
अर्जुन उवाच
जानता च परं धर्मं लोक्यं तेन महात्मना |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
जानता च महावाहो विदुरेण महात्मना |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
जानता तु कृतं पापं गुरु सर्वं भवत्युत |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
जानतापि नरेन्द्रेण ख्यापनार्थं परस्य वै |
२० क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
जानती चाप्यकर्तव्यं कन्याय़ा गर्भधारणम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
जानते त्वय़ि शंसन्ति सुहृदः कर्मचोदनाम् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
जानतोऽपि च ते व्यक्तं कथय़िष्ये निवोध तत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
जानतोऽविहितो मार्गो न कार्यो धर्मसङ्करः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
जानन्तस्तस्य कर्माणि कुरवः सव्यसाचिनः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
जानन्ति कुरवः सर्वे यथोक्ताः कुरुसंसदि |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
जानन्ति कुरवः सर्वे राजानश्चैव पार्थिवाः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
जानन्ति च भवन्तोऽपि सर्वमेतद्यथातथम् ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
जानन्ति तान्नमस्यामस्ते देवास्तात ते द्विजाः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४५
जनमेजय़ उवाच
जानन्ति तु भवन्तस्तद्यथावृत्तः पिता मम |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
जानन्ति त्वां सरिच्छ्रेष्ठे मुनय़ः संशितव्रताः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
जानन्ति युधि संरव्धा जीवितं परिरक्षितुम् ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र नष्टामपि सरस्वतीम् ||
८१ ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
जानन्तो विषमं कुर्युरस्मास्वत्यन्तवैरिणः |
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
जानन्तो व्यवसाय़ं च क्रूरं मारुततेजसः ||
८ ख