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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
उदीच्यां दिशि धर्मात्मा सोऽपश्यच्छ्वेतपर्वतम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
उदीच्यां दिशि यद्वृत्तं म्लेच्छेषु मनुजाधिप ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
उदीच्यां राजशार्दूल दिशि पुण्यानि यानि वै |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
उदीच्याः कृतवर्मा च पुरुमित्रः श्रुतार्पणः |
८४ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
उदीरिता अशृण्वंस्ते पाण्डवा हृदय़ङ्गमाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
उदीरिता मय़ा तुभ्यं पञ्चविंशेऽधि धिष्ठिता ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
दुर्योधन उवाच
उदीर्णं च वलं तेषां तेन युद्धं न रोचय़े ||
१५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
उदीर्णं चापि सुमहद्धार्तराष्ट्रवलं रणे ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
उदीर्णं वापि शरणं तथा भवति कामदः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतः स्थिरः |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
उदीर्णां पृथिवीं सर्वां साश्वां सरथकुञ्जराम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
उदीर्णाश्च महासेना व्रह्मक्षत्रस्य भारत |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
उदीर्णोऽर्जुनमेघोऽय़ं शमय़िष्यति संय़ुगे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
उदीर्णौ दहतः शत्रून्वनानीवाग्निमारुतौ ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
उदीर्यतो हय़ान्पश्य महाकाय़ान्महाजवान् |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
उदीर्यमाणं च वलं दृष्ट्वा राजा सुय़ोधनः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
उदीर्यमाणं तद्दृष्ट्वा पाण्डवानां महद्वलम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
उदीर्यमाणं द्रौणिं च निष्प्रतिद्वन्द्वमाहवे ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
उदीर्यमाणं राजानं क्रोधदीप्ता द्विजातय़ः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
उदीर्यमाणे द्रोणास्त्रे पाण्डवान्भय़माविशत् ||
६२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
उदीरय़न्तौ समरे दिव्यान्यस्त्राणि भागशः ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
उदीरय़ेतां व्राह्माणि दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
उदुम्वरं न खादेच्च भवार्थी पुरुषोत्तमः ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
ऋषय़ ऊचुः
उदुम्वराण्यथान्यानि हेमगर्भाण्युपाहरन् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
उदैक्षत दिशः सर्वा वचने गतमानसः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
उदैरय़द्व्राह्ममस्त्रं शरैः सम्पूरय़न्दिशः ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
उद्गाता चापि मां स्तौति गीतघोषैर्महाध्वरे |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
उद्गाता तत्र सङ्ग्रामे त्रिसामा दुन्दुभिः स्मृतः ||
२५ ग
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
उद्गाता व्राह्मणो वृद्धो विद्वान्कौत्सार्यजैमिनिः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
उद्गातात्र पुनर्भीमः प्रस्तोता सुमहावलः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
उद्गारमिव गौर्नर्दमुत्ससर्ज समन्ततः ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
उद्दध्रिरे नौभिरिवार्णवाद्रथैः; सुकल्पितैर्द्रौपदिजाः स्वमातुलान् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
उद्दानं क्रिय़माणं च मत्स्यानां वीक्ष्य रज्जुभिः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
उद्दालकं पितृवच्चापि मेने; अष्टावक्रो भ्रातृवच्छ्वेतकेतुम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
उद्दालकः शमठकः श्वेतकेतुश्च पञ्चमः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
उद्दालकः श्वेतकेतुं जनय़ामास शिष्यतः ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
उद्दालकः श्वेतकेतुस्तथा शाट्याय़नः प्रभुः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
उद्दालकस्तं तु तदा निशम्य; सूतेन वादेऽप्सु तथा निमज्जितम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
उद्दालकस्य निय़तः शिष्य एको; नाम्ना कहोडेति वभूव राजन् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
उद्दालकस्य पुत्रेण धर्म्या वै श्वेतकेतुना ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
उद्दिश्य पातान्पततः कुर्वतो भैरवान्रवान् |
३० क
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
उद्दिश्य मतिमान्प्राय़ान्महत्या सेनय़ा सह ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
उद्दिश्योद्दिश्य तेषां च चक्रे राजौर्ध्वदैहिकम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
उद्दिष्टास्ते तथाङ्गारा ये धिष्ण्येषु दिवि स्थिताः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
उद्दीपकाश्च गृध्राश्च कपोता भ्रमरास्तथा |
१०७ क
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
उद्देशज्ञाः कुवेरस्य नलिन्या भरतर्षभ ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
युधिष्ठिर उवाच
उद्देशतश्च गन्धर्वा विविधाश्च महर्षय़ः ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
उद्देशमात्रेण मय़ा देशाः सङ्कीर्तिताः प्रभो ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
उद्देशेन हि तेन स्म समय़ुध्यन्त पार्थिवाः ||
१७ ख