आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तो युधिष्ठिरो राजा भवद्वचनमादितः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तो रात्रौ मृगैरस्मि स्वप्नान्ते हतशेषितैः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तो वहुविधं राजा तत्र तत्र युधिष्ठिरः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
उक्तो हि विदुरेणेह हितं पथ्यं च सञ्जय़ |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
उक्तोऽसि वहुधा राजन्मा युध्यस्वेति पाण्डवैः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
उक्तोऽहं वहुशस्तात विदुरेण महात्मना |
३७ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
उक्तोऽय़मर्थ आचार्यो मय़ा कर्णेन चासकृत् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
उक्त्वा गालवमापृच्छ्य जगाम भवनं स्वकम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३४
एलापत्र उवाच
उक्त्वा चैवं गता देवाः स च देवः पितामहः ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
उक्त्वा तथा चैव चकार राजा; लेभे महीं सागरमेखलां च ||
११५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
उक्त्वा तथा त्वं पितुरग्रतो मा; महं हनिष्यामि महाव्रतं तम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
उक्त्वा तथासकृत्सर्वान्विकर्णः पृथिवीपतीन् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
धृतराष्ट्र उवाच
उक्त्वा दुर्योधनं सम्यङ्मम शास्त्रातिगं सुतम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
उक्त्वा पुत्रमधीष्वेति व्योमगङ्गामय़ात्तदा ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
उक्त्वा भीष्मवधाय़ेति प्रविवेश हुताशनम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
उक्त्वा यथावत्पुनरन्वपृच्छ; त्कथं सुभद्रा च तथाभिमन्युः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
व्यास उवाच
उक्त्वा वचनमीशानः साधय़स्वेत्यथाव्रवीत् ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३६
लोमश उवाच
उक्त्वा स पितरं श्लक्ष्णं यवक्रीरकुतोभय़ः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
उक्त्वाथानन्तरं व्रूय़ात्तेषामागमनं प्रति ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
उक्त्वाहं वः प्रपतिष्याम्यनन्तरं; त्वरन्ति मां व्राह्मणा लोकपालाः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
उक्त्वेह वितथं राजंश्चेदीनामीश्वरः प्रभुः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
उक्त्वैवं राक्षसेन्द्रं तं चकर्त नखरैर्भृशम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
उक्थो नाम महाभाग त्रिभिरुक्थैरभिष्टुतः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
उक्लापातकृतं यद्वत्प्रजानां सङ्क्षय़े नृप ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
उक्षाणमिव सिंहेन पात्यमानमचेतनम् ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
उग्रं तच्च महावेगं देवानीकं महाप्रभम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
उग्रं तपः समातिष्ठत्सहस्राक्षसमो भुवि |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
उग्रं तपः समारेभे व्रह्मचारी समाहितः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
उग्रं तपः समारोहेन्न ह्यनुप्तं प्ररोहति ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रं तपः समास्थास्ये त्वमनुज्ञातुमर्हसि ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रं तपश्चरसि वै विदिता मेऽसि सुव्रते |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
उग्रं तपस्तपस्यन्तं यमुनातीरमाश्रितम् |
५२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
उग्रं तेपे तपः कृष्णा भर्तॄणामर्थसिद्धय़े |
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
उग्रं दारुणमाक्रोशः परवित्तानुशासनम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रं पर्यचरं तत्र व्राह्मणं संशितव्रतम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रं पर्यचरद्घोरं व्राह्मणं संशितव्रतम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रं स तप आतस्थे परमेण समाधिना ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
उग्रं स्थाणुं शिवं घोरं शर्वं गौरीशमीश्वरम् ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
उग्रं स्थाणुं शिवं रुद्रं शर्वमीशानमीश्वरम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
ऋचीक उवाच
उग्रकर्मा भवेत्पुत्रश्चरुर्माता च कारणम् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
उग्रकर्मा महेष्वासो नामतः कर्मतस्तथा |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
उग्रतेजा महातेजा जय़ो विजय़कालवित् |
५५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
उग्रदण्डप्रधानाश्च मिथ्या व्याहारिणस्तथा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
उग्रधन्वा महेष्वासं यत्तो द्रोणादवारय़त् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
उग्रधन्वा महेष्वासो दिव्यं विस्फारय़न्धनुः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
उग्रधन्वा महेष्वासो दिव्यमस्त्रमुदीरय़न् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
उग्रधन्वानमुग्रेषुं वर्तमानं रथोत्तमे |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
उग्रप्रतिग्रहीतारं कामय़ानमिव स्त्रिय़ः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
उग्रमातिष्ठत तपः सह पत्न्यानुकूलय़ा ||
११ ख