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शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
अपारे यो भवेत्पारमप्लवे यः प्लवो भवेत् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
अपार्थकमनाय़ुष्यं गोविषाणस्य भक्षणम् |
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अपारय़न्तो मद्वाणान्सिंहशव्दान्मृगा इव ||
८० ख
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
अपारय़न्त्या दुःखानि न राजानमुपालभे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
अपालनं हन्ति पशूंश्च राज; न्नेकः क्रुद्धो व्राह्मणो हन्ति राष्ट्रम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
अपालिताः प्रजा यस्य सर्वा धर्मविनाकृताः ||
७१ ख
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
अपालय़त्सर्ववर्णान्पिता पुत्रानिवौरसान् ||
१३ ग
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अपालय़द्रणे शूरः सेनापतिररिन्दमः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अपावृतं पय़ोऽतिष्ठदुच्छिष्टाश्चास्पृशन्घृतम् ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
अपावृत्य स जग्रास वृत्रः क्रोधसमन्वितः ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
अपाश्रिताश्चेदिकरूषकाश्च; सर्वोत्साहैर्भूमिपालैः समेताः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
अपासर्पत्ततः स्थानात्सा मोघा न्यपतद्भुवि ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
अपास्ताश्च तथा राजन्विकुर्वन्ति मनः स्त्रिय़ः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अपास्य कामान्कामेशो वसेत्तत्राविचारय़न् ||
५५ ख
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अपास्य चास्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम् |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
अपास्य राजधानीं वा तरेदन्येन वापदम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
अपास्यान्यान्रणे योधानभ्यस्यति पितामहम् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
अपाहरदसम्भ्रान्तो जय़द्रथशिरो यथा ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाच्छस्त्रमुत्सृज्य कोपदुःखसमन्वितः ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाज्जवनैरश्वैः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाज्जवनैरश्वैः पाञ्चाल्यो द्रोणमभ्ययात् ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाज्जवनैरश्वैः पूर्ववैरमनुस्मरन् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाज्जवनैरश्वैः शकुनिः प्राकृतो यथा ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाज्जवनैरश्वैः सापेक्षो मातुलं प्रति ||
६८ ग
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
अपाय़ाज्जवनैरश्वैः साम्ववाणप्रपीडितः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाज्जवनैरश्वैर्द्रोणात्त्रस्तो युधिष्ठिरः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाज्जवनैरश्वैस्ततोऽनीकमभिद्यत ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ाद्द्रुपदो राजन्पूर्ववैरमनुस्मरन् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
अपाय़ासीद्रणात्तूर्णं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
अपि कीटः पतङ्गो वा भवेय़ं शङ्कराज्ञय़ा |
९६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
अपि कीटपतङ्गानां मृगाणां चैव शोभने |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
अपि कीटपिपीलानामशरण्यः सुनिर्घृणः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अपि कृत्वा नरः पापं भूमिं दत्त्वा द्विजातय़े |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
अपि कृष्णाय़ सुहृदस्तिष्ठेम वचने वय़म् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
अपि कौरवमुख्येन कृतास्त्रेण महात्मना |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
सत्यवानु उवाच
अपि खल्ववधेनैव प्राय़श्चित्तं विधीय़ते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
अपि गाथामिमां गीतां जनकेन वदन्त्युत |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
अपि गाथामिमां चापि वृहस्पतिरभाषत ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन पूय़ते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
अपि च त्वं नरव्याघ्र श्रोतुमर्हसि मे कथाम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
अपि च त्वां नय़िष्यामि नगरं स्वं शुचिस्मिते |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
अपि च भवति मैथिलेन गीतं; नगरमुपाहितमग्निनाभिवीक्ष्य |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
अपि चात्र पुरावृत्तं कथय़िष्यामि तेऽनघ |
७ क
वन पर्व
अध्याय १४१
भीम उवाच
अपि चात्र महाराज सव्यसाचिदिदृक्षय़ा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
अपि चात्र महाराज स्वय़ं विश्वावसुर्जगौ |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
अपि चात्र महाय़ोगी मार्कण्डेय़ो महातपाः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
अपि चात्र सनत्कुमारगीताः श्लोका भवन्ति ||
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
अपि चात्र स्वय़ं शक्रो जगौ गाथां सुराधिपः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अपि चापिहितः श्वभ्रे कृतविद्यः प्रकाशते ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
अपि चाप्यत्र कौन्तेय़ मन्त्रो वेदेषु पठ्यते |
१८ क