वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
उपरिष्टाच्च वृक्षस्य वलाका संन्यलीय़त |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
उपरिष्टात्ततस्तस्य सा वभूव पय़स्विनी ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
उपरिष्टात्ततोऽस्माकं वसन्त्येताः सदैव हि ||
२० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
उपरिष्टादतिक्रान्ताः शैलाभानां सहस्रशः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
उपरिष्टादसौ लोको योऽय़ं स्वरिति सञ्ज्ञितः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
उपरिष्टाद्गवां लोक एतदिच्छामि वेदितुम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
उपरिष्टोपरिष्टात्तु प्रज्वलद्भिः स्वय़म्प्रभैः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
उपरुन्धन्ति कृत्वा च नगराणि युय़ुत्सवः ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
उपरुन्धन्ति राजानो भूतानि विजय़ार्थिनः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
व्राह्मण उवाच
उपरोधं कृतवती न विसर्जितवत्यसि ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
उपरोधो भवेदेवमस्माकं तपसः कृते ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
उपर्याकाशगो वह्निर्विधूमः समदृश्यत ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
उपर्युपरि गच्छन्तं स्वं वै सेनापतिं प्रभुम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
उपर्युपरि गच्छन्तः शैलराजमुदङ्मुखाः ||
५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
उपर्युपरि चान्योन्यं चतुरङ्गं ममर्द ह ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
उपर्युपरि राज्ञां वै ज्वलितो भास्करो यथा |
२२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
उपर्युपरि राज्ञां हि तव लोका युधिष्ठिर |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
उपर्युपरि लोकस्य सर्वो गन्तुं समीहते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
उपर्युपरि लोकस्य सर्वो भवितुमिच्छति |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
उपर्युपरि वेगेन सागरं वरुणालय़म् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
उपर्युपरि शक्रस्य लोका दिव्यगुणान्विताः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
उपर्युपरि शत्रूणां वपुषा दीप्यते च सः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
उपर्युपरि शैलस्य गुहाः परमदुर्गमाः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
उपर्युपरि शैलस्य वह्वीश्च सरितः शिवाः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
उपर्युपरि शैलाग्रमारुरुक्षुरिव द्विपः |
४० ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
उपर्युपरि सर्वेषामादित्य इव तेजसा ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
उपर्युपरि सेनां ते तदा पर्यपतन्नृप ||
२५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
उपर्युपरि सैन्यानां तस्य शत्रोस्तदञ्जसा |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
उपलक्षय़ितव्यं ते नित्यमेव युधिष्ठिर ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
उपलभ्य च ते सञ्ज्ञामवस्थाप्य च वाहिनीम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
उपलभ्य ततः कर्णो विवृत्य नय़ने शुभे |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
उपलभ्य ततः प्राणान्धृतराष्ट्रो महीपतिः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
उपलभ्य ततः सञ्ज्ञां सुखसुप्त इवोत्थितः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
उपलभ्य मतिं चाग्र्यामरिमित्रान्तरं तथा |
२०५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
उपलभ्य रणे क्रीडेद्यथा शकुनिना शिशुः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
उपलभ्यान्तरा चान्यानाचारानववुध्यते ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
उपलभ्याप्सु चेद्गन्धं केचिद्व्रूय़ुरनैपुणात् |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
उपलव्धमिदं द्वारमश्वानामिति चाण्डजः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
उपलव्धा द्विजश्रेष्ठ तथेय़ं सिद्धिरुत्तमा |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
युधिष्ठिर उवाच
उपलव्धुं महावाहो तत्त्वेन कुरुनन्दन ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
उपवासं च कुर्वीत स्नातः शुचिरलङ्कृतः |
८१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
उपवासं च दीक्षां च अभिषेकं च पार्थिव |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
उपवासं च दीक्षां च अभिषेकं च पार्थिव |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
उपवासः परं पुण्यमुपवासः पराय़णम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
उपवासः सदा धर्मो व्राह्मणस्य न संशय़ः |
३१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
उपवासकृशश्चास्मि गान्धारीसहितोऽनघाः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
उपवासकृशो राजा भृशं भरतसत्तम |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
उपवासकृशोऽत्यर्थं स तु पार्थिव लुव्धकः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
उपवासतपःशीलः प्रजानां पालने रतः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
उपवासतपःशीला तत्र सा पृथुलेक्षणा |
४२ ख