शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
सच्चासच्चैव कौन्तेय़ मय़ावेशितमात्मनि |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
सच्चासच्चैव तद्द्वन्द्वं तय़ोर्मध्ये हुताशनः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
सच्छत्रकवचं चैव सशक्तिशरकार्मुकम् ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सच्छत्रध्वजय़न्तारं साश्वमाशु स्मय़न्निव ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सच्छत्रवालव्यजनो जय़शव्दान्तरेण च |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सजालश्च महातेजाः क्रथक्राथौ च भारत ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
सजीवा इव लक्ष्यन्ते गतसत्त्वा नराधिपाः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
सजीवांश्च नरान्पश्य कूजमानान्समन्ततः |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
सजीवे प्राणिशकले तत्यजाते सुदुःखिते ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जं क्रतुवरं राजन्कालप्राप्तं च भारत |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
सज्जन्ति पुरुषे नार्यः पुंसां सोऽर्थश्च पुष्कलः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जमानमनोदृष्टिः फुल्लेषु गिरिसानुषु |
२४ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जमाशु ततश्चक्रुः स्वसिद्ध्यर्थं समुत्सुकाः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
सज्जीकुरु रथं क्षिप्रं यस्ते साङ्ग्रामिको मतः |
२९ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जीकुरुत यानानि रत्नानि विविधानि च |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जीक्रिय़न्तां सर्वाणि शिविकाश्च सहस्रशः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जीभवत भद्रं वः पाण्डवा युद्धदुर्मदाः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जय़ध्वं प्रय़ास्यामो नगरं गजसाह्वय़म् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जय़न्ति स्म नागांश्च नागशिक्षासु निष्ठिताः ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
सज्जय़न्त्राय़ुधोपेतैः प्रय़यौ मारुतात्मजः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
सज्जय़न्त्रोपकरणं द्विषतां रोमहर्षणम् ||
६७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सज्जय़ित्वा रथान्केचिद्यथामुख्यं विशां पते |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
सज्ञातिमित्रः ससुहृच्चिरं जीवेदनामय़ः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सज्ञातिवान्धवः शूरः समरे युद्धदुर्मदः |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सज्यं कृत्वा निमेषात्तद्विव्याधार्जुनकेशवौ |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सज्यं कृत्वा महाराज संमृज्य च पुनः पुनः ||
३३ ग
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण; शरांश्च जग्राह दशार्धसङ्ख्यान् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
सज्यं चकार तच्चाशु चिच्छेदास्य स सात्यकिः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
सज्यं चास्य धनुः शीघ्रं चिच्छेद लघुहस्तवत् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
सज्यं धनुर्वरं कृत्वा ज्याघोषेण निनादय़न् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
सज्यं वृकोदरः कृत्वा सुषेणस्याच्छिनद्धनुः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
सज्यं सज्यं पुनश्चास्य चिच्छेद निशितैः शरैः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सज्यमन्यद्धनुः कृत्वा पञ्चभिः समताडय़त् |
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सज्यमन्यद्धनुः कृत्वा शैनेय़ं प्रत्यवारय़त् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सज्यमस्य धनुः कण्ठे सोऽवासृजत भारत ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
सज्वालैः पवनोद्धूतैर्विस्फुलिङ्गैः समन्वितः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सजय़ाशीः सपुण्याहः सूतमागधनिस्वनः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
सजय़ैश्च नरैर्मुख्यैर्वहुशो मुख्यकर्मभिः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
सञ्चकर्तुश्च जघ्नुश्च क्रुद्धा निर्विभिदुश्च ह ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
सञ्चचाल महाराज वित्रस्ता चाभवद्भृशम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
सञ्चचाल रणे कर्णः क्षितिकम्पे यथाचलः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
सञ्चचाल वलं सर्वं पलाय़नपराय़णम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
जरितो उवाच
सञ्चरन्तं समादाय़ जहाराखुं विलाद्वली ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चरन्नस्मि कौन्तेय़ सर्वलोकान्यदृच्छय़ा |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चरिष्यति लोकांश्च देवगन्धर्वरक्षसाम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चारकः कोकनदो गृध्रवक्त्रश्च जम्वुकः ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चारय़ामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भृगुरु उवाच
सञ्चाल्य पापकर्माणमिन्द्रस्थानात्सुदुर्मतिम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
सञ्चिक्षेप ततः शास्त्रं महार्थं व्रह्मणा कृतम् ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
सञ्चिक्षेपेश्वरो वुद्ध्या वार्हस्पत्यं तदुच्यते ||
९० ख