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द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
जेतारो वृष्णिवीराणां न पुनर्मानुषा रणे ||
२३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
जेतुं नोत्सहते कश्चिन्नाप्युद्यातुं कथञ्चन |
९५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३१
व्राह्मण उवाच
जेतुं परानुत्सहते प्रशान्तात्मा जितेन्द्रिय़ः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
जेतुं पुरुषशार्दूल योऽपि स्याद्वासवोपमः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
जेतुं पुरुषशार्दूलं शार्दूलमिव वेगितम् ||
७४ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
जेतुमुत्सहते कश्चिदपि देवेषु पावकिः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
जेतुमुत्सहते पार्थान्सगोविन्दान्ससात्वतान् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
जेतुमुत्सहते पार्थान्सपुत्रान्सहकेशवान् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
जेपुश्च शतरुद्रीय़ं देवाः कृत्वाञ्जलिं ततः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
जेष्यामस्तान्वय़ं राजन्रोचतां ते परन्तप ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
कर्ण उवाच
जेष्यामि पाण्डवान्राजन्सपुत्रान्सजनार्दनान् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
जेष्यामि पुरुषव्याघ्र भवान्सेनापतिर्यदि ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
जेष्याम्यद्य रणे पार्थं साय़कैर्नतपर्वभिः |
५८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
जैगीषव्यं च तैः सिद्धैः पूज्यमानमपश्यत ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
जैगीषव्यं ततोऽपश्यद्गतं प्रागेव भारत ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
जैगीषव्यं तपश्चास्य प्रशंसन्ति तपस्विनः ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
जैगीषव्यं न पश्यामि तं शंसत महौजसम् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
जैगीषव्यं महाप्राज्ञं धर्माणामागतागमम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
जैगीषव्यं मुनिं चैव न ददर्शाथ देवलः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
जैगीषव्यस्य संवादमसितस्य च भारत ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
विश्वावसुरु उवाच
जैगीषव्यस्यासितस्य देवलस्य च मे श्रुतम् |
५७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
जैगीषव्ये तपो नास्ति विस्मापय़ति योऽसितम् ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
जैगीषव्यो गतो लोकं शाश्वतं व्रह्मणोऽव्ययम् ||
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
जैगीषव्यो मुनिर्धीमांस्तस्मिंस्तीर्थे समाहितः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
जैत्रेण विधिनाहूतं वाय़ुरिन्द्रमिवाध्वरे ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
जैत्रैः साङ्ग्रामिकैर्मन्त्रैः पूर्वमेव रथोत्तमम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
जैत्रो रथवरः पुण्यो मेघसागरनिःस्वनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
युधिष्ठिर उवाच
जैत्र्या वा कानि रूपाणि भवन्ति पुरुषर्षभ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
जैत्र्या वा यानि रूपाणि भवन्ति पुरुषर्षभ |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
जैमिनिं च महाप्राज्ञं पैलं चापि तपस्विनम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
जोषमास्स्व न मां भूय़ो वक्तुमर्हस्यतः परम् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
जोषय़ेत सदा भोज्यं ग्रासमागतमस्पृहः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
जोषय़ेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
ज्ञातं वा यदि वाज्ञातं तदृतं व्रूत माचिरम् ||
१५ ग
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
ज्ञातः पापो धार्तराष्ट्रो दृष्टश्चेत्यसकृद्रणे |
४८ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
ज्ञातमात्रेऽपि दास्यामि गवां दशशतं धनम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातमेव हि ते वाक्यं यन्मय़ोक्तः सुय़ोधनः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
ज्ञातवान्देववाक्येन अम्वाय़ास्तपसा तथा ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
ज्ञातव्यश्च हि मे राजा रक्षितव्यश्च सात्यकिः ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ३७
दुर्योधन उवाच
ज्ञाताः पुनश्चरिष्यन्ति द्वादशान्यान्हि वत्सरान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
ज्ञातारमनुधर्माणां त्वां विदुः सर्वपार्थिवाः ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ६७
शकुनिरु उवाच
ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
ज्ञातिः सुहृत्स्वजनो यो यथेह; क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
ज्ञातिक्षय़भय़ाद्राजन्भीतेन भरतर्षभ ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
ज्ञातित्राणमभीप्सद्भिरस्मत्सम्भावना कृता |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
ज्ञातिभिः पतितैः शूरैर्याच्यमानास्तथोदकम् ||
५३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
ज्ञातिभिः परिभूतानां कृतमुद्धर्षणं मय़ा ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
ज्ञातिभिः सह कार्याणि न विरोधः कथञ्चन ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
ज्ञातिभिः सह मोदध्वमेतत्प्रेतेषु दुर्लभम् ||
२० ख