शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
गाङ्गेय़ः पूर्वमभवन्महाय़ोगवलान्वितः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
गाङ्गेय़ः शन्तनोः पुत्रो वसुरेष महाय़शाः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
गाङ्गेय़मर्जुनेनाजौ निहतं भूरिवर्चसम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़मुपसङ्गम्य विनय़ेनाभिवाद्य च ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़शरनुन्नानि न्यपतन्त महीतले ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़सारथिं सङ्ख्ये निर्विभेद त्रिभिः शरैः ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
गाङ्गेय़स्तस्य पुत्रोऽभून्नाम्ना देवव्रतो वसुः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़स्तु रणे पार्थं विद्ध्वा नाकम्पय़द्वली |
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़स्तु रणे पार्थमानर्छन्नवभिः शरैः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
गाङ्गेय़स्य च सांनिध्ये व्यासस्य विदुरस्य च ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़स्य रथाभ्याशमुपजग्मे महाभय़े ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़ार्जुनय़ोः सङ्ख्ये स्तवय़ुक्ता विशां पते ||
६७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
गाङ्गेय़े निहते शूरे दिव्यास्त्रवति सञ्जय़ |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
जनमेजय़ उवाच
गाङ्गेय़े पुरुषव्याघ्रे पाण्डवैः पर्युपस्थिते ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़ो भगदत्तश्च गौतमश्च महारथः |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़ो भरतश्रेष्ठः सर्वेषां नः पितामहः ||
४० ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
गाङ्गेय़ो युधि दुर्धर्षस्तस्थौ दीर्घमिवातुरः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़ो रथिनां श्रेष्ठः पाण्डवानामनीकिनीम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़ो रथिनां श्रेष्ठो निहतो याज्ञसेनिना ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
गाढविद्धानरीन्कृत्वा मार्गणैः सोऽतितेजनैः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
गाणपत्यं स लभते देहं त्यक्त्वा न संशय़ः ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
गाणपत्यमवाप्नोति कुलं चोद्धरते स्वकम् ||
१५४ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवं कार्मुकश्रेष्ठं वरुणाय़ैव दीय़ताम् ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं ते चाश्वा वातरंहसः ||
३१ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं न मुमोच धनञ्जय़ः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
गाण्डीवं च धनुर्दिव्यं योद्धा चाहं नरर्षभ |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवं चेषुधी चैव रथं च ध्वजमेव च |
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
गाण्डीवं ज्यां च वाणांश्च अनुमन्त्र्य धनञ्जय़ः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवं दिव्यकर्मा तद्राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
अर्जुन उवाच
गाण्डीवं धनुरादाय़ तथाक्षय़्यौ महेषुधी |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवं धनुरादाय़ तस्थौ गिरिरिवाचलः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवं धनुरादाय़ शरांश्चाशीविषोपमान् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवं धारय़न्धीमान्कीदृशं वो मनस्तदा ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवं पावकाल्लेभे खाण्डवे पाकशासनिः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवं प्राक्षिपत्पार्थः कृष्णोऽप्यव्जमवादय़त् ||
३१ ग
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
गाण्डीवं मुहुरादत्ते निःश्वसंश्च निरीक्षते ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवं विक्षिपंस्तूर्णं सहसा समुपाद्रवत् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
गाण्डीवं स्रुक्तथाज्यं च वीर्यं पुंसां भविष्यति ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवघोषः स्तनय़ित्नुकल्पो; जगाम पार्थस्य नभो दिशश्च |
१०५ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवघोषेण मनांसि तेषां; महावलः प्रव्यथय़ां चकार ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवधन्वन्सङ्ग्रामे ये त्वय़ा धनुषा जिताः |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवधन्वा च वृकोदरश्च; संरम्भिणावन्तककालकल्पौ |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवधन्वा ये चान्ये राजानस्तत्र केचन |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवधन्वा विस्फार्य धनुस्तानहनच्छरैः ||
४५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वः कपिप्रवरकेतनः ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
गाण्डीवधन्वा श्वेताश्वो वीभत्सुः किं करिष्यति ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवधन्वा सङ्क्रुद्धः शितान्संनतपर्वणः |
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवप्रभवाः कर्णं हंसाः क्रौञ्चमिवाविशन् ||
८२ ख