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उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
अर्थना न मय़ा काचित्कृतपूर्वा दिवौकसाम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
भगवानु उवाच
अर्थप्राप्तिः कदाचित्स्यादन्ततो वाप्यवाच्यता ||
८८ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
अर्थप्राप्तौ च नरकः कृत्स्न एवोपपद्यते ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थमर्थानुवन्धं च धर्मं धर्मानुवन्धनम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थमानप्रदानाभ्यां सञ्जहार सहानुजः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
अर्थमानविवृद्धाश्च रथचर्याविशारदाः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
अर्थमानार्घ्यसत्कारैर्भोगैरुच्चावचैः प्रिय़ान् |
७ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थमुत्सृज्य किं राजन्दुर्गेषु परितप्यसे ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
अर्थमूलोऽपहिंसां च कुरुते स्वय़मात्मनः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थमृच्छति कामार्थी न कामादन्यमृच्छती ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
अर्थर्क्षपुत्रः कौन्तेय़ कुरूणामृषभो वली |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थलुव्धान्न वः पार्थो मन्यते सात्वतान्सदा |
३ क
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थलुव्धोऽभिमानी च नीचः प्रकृतिनिर्घृणः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अर्थलोभान्नरव्याघ्र वृथा च व्रह्मचारिणः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
अर्थवच्च विचित्रं च न शक्यं वहु भाषितुम् ||
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
अर्थवन्तो न चोत्सिक्ता व्रह्मण्याः सत्यवादिनः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
अर्थवन्त्युपपन्नानि वाक्यानि गुणवन्ति च |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १३०
दुर्योधन उवाच
अर्थवर्गः सहामात्यो मत्संस्थोऽद्य महीपते ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थशास्त्रमिदं पुण्यं धर्मशास्त्रमिदं परम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
अर्थश्च तव धर्मश्च भूय़ानत्र प्रदृश्यते ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थश्च सुमहान्प्राप्तो येन यक्ष्यामि देवताः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
राम उवाच
अर्थश्चात्यर्थलुव्धस्य कामश्चातिप्रसङ्गिनः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थश्रेय़सि चासक्तो न श्रेय़ो विन्दते नरः |
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
अर्थसिद्धिं तव रणे करिष्यति न संशय़ः ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
अर्थसिद्धिं त्वनपगां जरासन्धोऽभिमन्यते |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
अर्थसिद्धिं परामिच्छन्धर्ममेवादितश्चरेत् |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५
वासुदेव उवाच
अर्थसिद्धिकरं राज्ञः पाण्डवस्य महौजसः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
अर्थसिद्धिमनर्थं च जीवितं मरणं तथा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
अर्थसिद्धेः परं धर्मं मन्यते यो महीपतिः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थसिद्ध्या हि निर्वृत्तावुभावेतौ भविष्यतः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
कृप उवाच
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् |
६६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
शल्य उवाच
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अर्थस्य रक्षणार्थाय़ परेषां धर्मकारणात् |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
अर्थस्य विघ्नं कुर्वाणा हन्तव्या भूतिवर्धनाः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थस्यावय़वावेतौ धर्मकामाविति श्रुतिः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थस्योपार्जने दुःखं पालने च क्षय़े तथा |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अर्थहेतोर्नरश्रेष्ठ क्रिय़ते कर्म कुत्सितम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
युधिष्ठिर उवाच
अर्थहेतोर्हताः क्रूरैरस्माभिः पापवुद्धिभिः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
अर्थहेतोर्हि कामाद्वाद्वारा वीभत्सय़ापि वा |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय १२
युधिष्ठिर उवाच
अर्थहेतोस्तथैवान्ये प्रिय़मेव वदन्त्युत ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चापि तेऽसुखाः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
अर्था ह्येवाधिगम्यन्ते सङ्घातवलपौरुषात् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
अर्थांश्च दुर्लभाँल्लोके क्लेशांश्च सुलभांस्तथा |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते वुधैः ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
अर्थांश्चिन्तय़तश्चापि कामय़ानस्य वा पुनः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
अर्थांस्तथात्यन्तसुखावहांश्च; लिप्सन्त एते वहवो विशुल्काः |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
अर्थांस्त्यजत पात्रेभ्यः सुतान्प्राप्नुत कामजान् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
अर्थाः खलु समृद्धा हि वाढं दुःखं विजानताम् |
५ क