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शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
उग्रव्रतधरो रुद्रो योगी त्रिपुरदारुणः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३६
सूत उवाच
उग्रश्रवसमामन्त्र्य उपपन्नमिति व्रुवन् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १०८
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रश्रवा अश्वसेनः सेनानीर्दुष्पराजय़ः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रसेन इति ख्यात उग्रकर्मा नराधिपः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रसेनः कृतो राजा भोजराजन्यवर्धनः ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रसेनसुतः कंसः परित्यक्तः स वान्धवैः |
३७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रसेनस्तथा कंसो वसुदेवश्च वीर्यवान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
भीष्म उवाच
उग्रसेनस्य संवादं नारदे केशवस्य च ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
उग्रस्य सशिरस्त्राणं शिरश्चन्द्रोपमं भुवि |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
उग्रस्वना मन्युमन्तो युद्धेष्वारावसारिणः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
उग्रा घोरा तनूर्यास्य सोऽग्निर्विद्युत्स भास्करः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रां नानाप्रहरणां तपोवीर्यवलान्विताम् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
गण्डो उवाच
उग्रादितो भय़ाद्यस्माद्विभ्यतीमे ममेश्वराः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
उग्रान्नं गर्हितं देवि गणान्नं श्राद्धसूतकम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
उग्राभिरुग्ररूपाभिर्वृहतीभिः परस्परम् |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
उग्राश्च क्रूरकर्माणस्तुखारा यवनाः खशाः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
उग्रास्त्वद्भुजनिर्मुक्ता मर्म भित्त्वा शिताः शराः |
८५ क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
उग्राय़ तपसे भूय़ो जगाम कृतनिश्चय़ः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
उग्राय़ुधस्ततस्तस्य शिरः काय़ादपाहरत् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
उग्राय़ुधाय़ देवाय़ नमः सुरवराय़ च |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय १०८
वैशम्पाय़न उवाच
उग्राय़ुधो भीमकर्मा कनकाय़ुर्दृढाय़ुधः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
उग्राय़ुधो महेष्वासो धार्तराष्ट्रहिते रतः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
उग्राय़ुधो वलाकी च कनकाय़ुर्विरोचनः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
उग्राय़ैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे न त्ववेक्षसे |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
उग्रे कर्मणि सृष्टोऽसि तस्माद्राज्यं प्रशाधि वै ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रे तपसि दुष्पारे स्थितो धूमाय़यन्दिशः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
उग्रे तपसि वर्तन्तं पितरश्चोदय़न्ति माम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
होत्रवाहन उवाच
उग्रे तपसि वर्तन्तं सत्यसन्धं महावलम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १००
नारद उवाच
उग्रे तपसि वर्तन्ते येषां विभ्यति देवताः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रेण तपसा तेन प्रणिपातेन शङ्करः |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रेण तपसा युक्ता सततं सत्यवादिनी ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
उग्रैर्नाकम्पय़द्विद्ध्वा मैनाकमिव पर्वतम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
उग्रैर्नित्यमनाधृष्यं कूर्मग्राहसमाकुलम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
भीम उवाच
उग्रैर्वाणैराहवं घोररूपं; नष्टादित्यं मृत्युलोकेन तुल्यम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
उग्रो भीमरथो भीमो भीमवाहुरलोलुपः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १०८
वैशम्पाय़न उवाच
उग्रो भीमरथो वीरो वीरवाहुरलोलुपः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः |
९७ क
वन पर्व
अध्याय ११५
अकृतव्रण उवाच
उचितं नः कुले किञ्चित्पूर्वैर्यत्सम्प्रवर्तितम् ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
उचितं हि कुलेऽस्माकमरण्यगमनं प्रभो ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
उचितं हि सदा गन्तुं घोषय़ात्रां विशां पते |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १९६
द्रोण उवाच
उचितत्वं प्रिय़त्वं च योगस्यापि च वर्णय़ेत् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
उचितश्चैव सम्वन्धः सुभद्रा च यशस्विनी |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
उचितस्त्वं वने भीम न त्वं युद्धविशारदः ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
उचिताश्चैव सम्वन्धे तेऽस्माकं क्षत्रिय़र्षभाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
उचितेनैव भोक्तव्यास्ते भविष्यन्ति यत्नतः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
उच्चं पर्वतमारुह्य नान्ववेक्षेत भूगतम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
उच्चं पर्वतमारूढो भीमकर्मा वृकोदरः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
उच्चकर्त शिरांस्युग्रो यवनानां भुजानपि ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
उच्चमध्यमनीचानां तामहं कथमावसे ||
३० ख