शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
उपोपविविशे तत्र पीठे कुशमय़े शुभे ||
३० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
उपोपविश्य प्रणतः पर्यपृच्छदिदं तदा ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
उपोपविश्य प्रीतात्मा पर्यपृच्छदनामय़म् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
उपोपविश्य विद्वांसः सहिताः संशितव्रताः ||
१ ग
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
उपोपविष्टः कल्याणीः कथाश्चक्रे महामनाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
उपोपविष्टः सुप्रीतो नारदो भगवानृषिः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
उपोपविष्टस्तैः सर्वैर्वृष्णिभिः परिवारितः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
उपोपविष्टा नारीभिराश्रमे परिवारिता ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
उपोपविष्टा राजानं परिवार्य युधिष्ठिरम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
उपोपविष्टाः पश्यध्वं विमर्दं नृपसत्तमाः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
उपोष्य चापि किं तेन प्रदेय़ं स्यान्नराधिप |
६ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
उपोष्य रजनीमेकामग्निष्टोमफलं लभेत् ||
११५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
उपोष्य विधिवद्देवास्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
उपोष्य व्याधिरहितो वीर्यवानभिजाय़ते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
उपोष्य संशितो भूत्वा हित्वा वेदकृताः श्रुतीः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
उपोष्य सम्यक्षुद्धात्मा योगी वलमवाप्नुय़ात् ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
उपोष्येह नरश्रेष्ठ किं फलं प्रतिपद्यते ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
उपोह्यमाने द्यूते तु राजानः सर्व एव ते |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
उप्यते तत्र यद्वीजं तद्धि पुण्यफलं महत् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
उपय़ाज कृते तस्मिन्गवां दातास्मि तेऽर्वुदम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
उपय़ाजवचः श्रुत्वा नृपतिः सर्वधर्मवित् |
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
उपय़ाजोऽव्रवीद्राजन्काले मधुरय़ा गिरा ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ातं तु वार्ष्णेय़ं भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
उपय़ातं दुराधर्षं शङ्खचक्रगदाधरम् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
उपय़ातमुपप्लव्यं सह गाण्डीवधन्वना |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ाता नरव्याघ्रा य इमे जगदीश्वराः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
उपय़ाता नरव्याघ्राः पाञ्चालाश्च यशस्विनः ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
उपय़ाता नरव्याघ्राः पूर्वां सन्ध्यां प्रति प्रभो ||
४३ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ातानतिरथान्द्रोणं शान्तनवं कृपम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
उपय़ातो नरव्याघ्र लोकपालो यमस्तदा |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
उपय़ात्वाद्य शाल्वेन द्वारकां वृष्णिनन्दन |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
उपय़ान्तं रिपून्हत्वा सोऽद्य मां किं न पश्यति ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ास्यति दाशार्हः पाण्डवार्थे पराक्रमी |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ास्यति यज्ञं नो मणिपूरपतिर्नृपः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
उपय़ास्यामि धर्मज्ञ भवतः शासनादहम् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
उपय़ाय़ च मामूचुर्दिष्ट्या जीवसि सञ्जय़ ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ाय़ तु स क्षिप्रं रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
उपय़ुक्तश्च स तेनानिवेद्य गुरवे |
७३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
उपय़ुङ्क्ते च तानेव स चैवाज्ञः स्वभावतः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
उपय़ुज्याशु कर्मेदं साधय़ेप्सितमात्मनः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
उपय़ेमे महावीर्यो रूपद्रविणसंमते ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ोक्तुं तदिच्छामि वाजिमेधे महाक्रतौ ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ोक्तुं द्विजाग्र्येषु हव्यवाहे च माधव ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ोगात्फलस्येव काष्ठाद्भस्मेव पण्डितः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
उपय़ोज्यश्चरुरय़ं त्वय़ा मात्राप्ययं तव ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
उभाभ्यामभ्यनुज्ञाता सा जगाम यशस्विनी |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
उभावजेय़ावहितान्तकावुभौ; जिघांसतुस्तौ कृतिनौ परस्परम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
उभावपसदावेतौ कर्मवुद्धिः प्रशस्यते ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
उभावपि चकाशेते प्रय़ुद्धौ वृषभाविव ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानावरिन्दमौ ||
६ ख