शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
सङ्ग्रहानुग्रहे यत्नः सदा कार्योऽनसूय़ता |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
सङ्ग्रहेणैष धर्मः स्यात्कामादन्यः प्रवर्तते ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सङ्ग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
सङ्ग्रामं तुमुलं घोरं जय़ं चैव महात्मनः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामं योजय़ेत्तत्र तां ह्याहुः शक्रदेवताम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामकोविदं पार्थं सर्वे युद्धविशारदाः |
४२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रामचन्द्रोदय़वेगवेलं; द्रोणार्णवं ज्यातलनेमिघोषम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामजलदापूर्णां प्रासमत्स्यसमाकुलाम् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रामजिद्दुर्मुखश्च उग्रसेनश्च वीर्यवान् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामदुर्मदा राजन्राजपुत्राः प्रहारिणः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामनिर्जिताँल्लोकान्गमितो द्रोणसाय़कैः ||
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्राममनसः शूरा दृश्यन्ते स्म सहस्रशः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्राममनसः शूरास्तत्र तत्र व्यवस्थिताः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामरभसो भीमं हन्तुकामोऽभ्यधावत ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रामविमुखाः सर्वे योधास्ते हतचेतसः ||
१२ ग
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रामशिरसो मध्ये तां रात्रिं सुखिनोऽवसन् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामशिरसो मध्ये भीमं द्वावभ्यधावताम् |
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामशिरसो मध्ये सर्वेषां तत्र पश्यताम् ||
६४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामस्तु न कर्तव्यः सर्वसैन्यान्व्रवीमि वः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामस्तुमुलो राजन्प्रावर्तत सुदारुणः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
सङ्ग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामस्यातिघोरस्य वध्यतां चाभितो युधि ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामादपय़ातानां भग्नानां शरणैषिणाम् |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामाद्विनिवृत्तानां सर्वेषां नो विशां पते |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामाद्विमुखः कर्तुं धर्मज्ञ इव नास्तिकैः ||
९६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामाद्व्यपय़ातव्यमेतत्कर्म ममाह्निकम् |
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
सङ्ग्रामान्सुवहूञ्जित्वा लव्ध्वा च विपुलं धनम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रामान्सुवहून्कृत्वा क्षत्रिय़ैर्दस्युभिस्तथा ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
धृतराष्ट्र उवाच
सङ्ग्रामे किमकुर्वन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे क्रिय़तां यत्नो व्रवीम्येष पुनः पुनः |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे घोररूपे तु यमराष्ट्रविवर्धने ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे चेरतुर्वीरौ भगदत्तधनञ्जय़ौ ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे तुमुले तस्मिन्निति संमेनिरे जनाः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे दैत्यसङ्काशे तस्मिन्योद्धा नराधिप ||
८६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे न जहुर्भीष्मं युध्यमानं किरीटिना ||
७७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
सङ्ग्रामे नरवीराणां तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१०९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे नाजहुर्भीष्मं वध्यमानाः शितैः शरैः ||
७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे निघ्नतः शत्रूञ्शरौघैर्विमलैरहम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे निधनं प्राप्य ध्रुवं स्वर्गो भविष्यति ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रामे निश्चय़ं कृत्वा पुनर्युद्धाय़ निर्ययौ ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
सङ्ग्रामे निहता ये ते दैत्यदानवराक्षसाः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
सङ्ग्रामे पृथिवीशानां मन्दस्यावुद्धिसम्भवम् |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे भरतश्रेष्ठ देवानां दानवैरिव ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे भीष्ममासाद्य व्यादितास्यमिवान्तकम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे भीष्ममासाद्य सवाजिरथकुञ्जराः |
७४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
सङ्ग्रामे यदि निर्जेतुं कर्ण कामय़सेऽर्जुनम् ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
सङ्ग्रामे युध्यतो राजन्नागतः परवीरहा ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
सङ्ग्रामे युध्यमानस्य तेनाहं श्वेतवाहनः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे युध्यमानस्य वहतो महतीं धुरम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
सङ्ग्रामे युध्यमानस्य शक्रचापनिभं महत् ||
३५ ख