शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
उच्चस्य नीचेन हि सम्प्रय़ोगं; विगर्हय़न्ति स्थिरवुद्धय़ो ये ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
उच्चावचं दैवय़ुक्तं रहस्यं; दिव्याः प्रश्ना मृगचक्रा मुहूर्ताः |
९३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चावचं पार्थिवभोजनीय़ं; पात्रीषु जाम्वूनदराजतीषु |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चावचं वलं ज्ञात्वा मध्यस्थं चापि भारत |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
उच्चावचकरा न्याय़्याः पूर्वराज्ञां युधिष्ठिर |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चावचमुपादाय़ धर्मराजाय़ माधवः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
उच्चावचा निपेतुर्वै गरुडानिलरंहसः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान्द्विजेभ्यो विप्रदाय़ सः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
उच्चावचानि रूपाणि चकार सुवहूनि च |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
उच्चावचानि वृत्तानि धर्मज्ञानां युधिष्ठिर |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
उच्चावचानुपग्राहान्राजभिः प्रहितान्वहून् |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चावचान्मृगाञ्जघ्नुर्मेध्यांश्च शतशः पशून् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
उच्चावचाश्च वहवो नानावर्णा विषोल्वणाः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
उच्चावचास्तथा वाचो व्याजहार समन्ततः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चिक्षेप पुनर्दोर्भ्यामिन्द्राय़ुधमिवोच्छ्रितम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
उच्चिष्टं तु यवक्रीतमपकृष्टकमण्डलुम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चुक्रुशुश्च कौरव्या गन्धर्वान्प्रेक्ष्य पीडितान् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
उच्चुक्रुशुस्तथान्योन्यं जघ्नुरन्योन्यमाहवे ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चेरुर्मधुरा वाचो गीतवादित्रसंहिताः ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चैः प्रचुक्रोश च कौरवाग्र्यः; पपात चोर्व्यां सगणो विसञ्ज्ञः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
अष्टक उवाच
उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
उच्चैः समभिभाषन्तौ केन कार्येण विष्ठितौ ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चैः सूर्यमुपप्लव्यं शार्ङ्गधन्वानमावहन् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
उच्चैःश्रवसमप्यश्वं प्रापणीय़ं सतां विदुः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
उच्चैःश्रवस्तुल्यवलं वाय़ुवेगसमं जवे |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८
सूत उवाच
उच्चैःश्रवा नु किंवर्णो भद्रे जानीहि माचिरम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चैःश्रवा भद्रकारो जितारिश्चाष्टमः स्मृतः |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
उच्चैःश्रवा वरोऽश्वानां राज्ञां वैश्रवणो वरः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चैःश्रवा हय़श्रेष्ठो नागराजश्च वामनः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
उच्चैःश्रवाश्चाश्वराजो मणिरत्नं च कौस्तुभम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
उच्चैःस्थाने घोररूपो नक्षत्राणामिव ग्रहः |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
उच्चैरनुपमैः स्निग्धैः स्वरैरापूर्य मेदिनीम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
उच्चैराकाशमार्गेण ह्रिय़ामस्तैः सुदुःखिताः ||
४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
उच्चैर्गिरी रैवतको यत्र नित्यं प्रतिष्ठितः |
१६ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चैर्जह्रुरप्सरसो दिवानिशं; वाचश्चोचुर्गम्यतां तीर्थय़ात्रा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
उच्चैर्वृत्तेः श्रिय़ो हानिर्यथैव मरणं तथा |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
उच्चैश्च चतुराशीतिर्योजनानां महीपते |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
उच्छिखः सुरसो द्रङ्गो वलहेडो विरोहणः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
उच्छिद्यते धर्मवृत्तमधर्मो वर्तते महान् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
उच्छिद्यमानमात्मानं ज्ञात्वा राजा महामतिः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
उच्छिष्टं नैव भुञ्जीय़ां न कुर्यां पादधावनम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
उच्छिष्टं भुञ्जते भर्तुः सा तु नित्यं युधिष्ठिर |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
उच्छिष्टदर्पितः काको वहूनां दूरपातिनाम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
उच्छिष्टदर्पितो हंस मन्येऽऽत्मानं सुपर्णवत् |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
उच्छिष्टभोजनात्काको यथा वैश्यकुले तु सः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
उच्छिष्टभोजिनो मन्दानन्ये वै विघसाशिनः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रिय़म् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
उच्छिष्टास्मीति मन्वाना लज्जिता भर्तुरेव च |
६० क