भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽपि नृपतिः परिवार्य महारणे |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्योधनोऽपि यच्चक्रे दृष्ट्वा स्वान्विमुखान्रणे |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र पाञ्चाल्यस्योत्तमौजसः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र विसृज्य नरपुङ्गवान् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितौघपरिप्लुतः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽपि विंशत्या शराणां प्रत्यविध्यत ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽपि सम्प्रेक्ष्य पातितं वरवारणम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽपि सहितो भ्रातृभिर्भरतर्षभ |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽभवन्मध्ये रक्षितः कुरुपुङ्गवैः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽभ्ययादेको निघ्नन्वाणैः पृथग्विधैः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
दुर्योधनोऽर्जुनश्चैव वासुदेवमुपस्थितौ ||
१३६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽव्रवीत्कर्णं प्रहृष्टः प्रहसन्निव ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्योधनोऽव्रवीत्किं नु सौवलो वापि सञ्जय़ ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽश्रुप्रतिपूर्णनेत्रो; मुहुर्मुहुर्न्यश्वसदार्तरूपः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
दुर्लभं किं नु विप्रर्षे आशाय़ाश्चैव किं भवेत् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
दुर्लभं जीवितं मन्ये कौरव्यस्य किरीटिना |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
दुर्लभं तमलव्धा हि हन्यात्पापेन कर्मणा ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
दुर्लभं मानुषैर्मन्दैर्महाभाग्यमवाप्य तु |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
दुर्लभं सलिलं तात विशेषेण परत्र वै |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
दुर्लभं ह्यन्तरं राज्ञो व्यूहस्यामिततेजसः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
दुर्लभः पुरुषः कश्चिदेभिर्गुणगुणैर्युतः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
दुर्लभः स पुनः कालः कालधर्मचिकीर्षुणा ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
दुर्लभः स मय़ा द्रष्टुं नूनं परमधार्मिकः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
दुर्लभः स मय़ा द्रष्टुमाशा च महती मम |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
राजो उवाच
दुर्लभत्वं च तस्यैव वेदवाक्यमिव द्विज ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय़ श्रुतिपूर्वकम् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
युधिष्ठिर उवाच
दुर्लभत्वाच्च पश्यामि किमन्यद्दुर्लभं ततः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
दुर्लभत्वाद्धय़ानां च प्रददौ माधवीं पुनः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
दुर्लभा वेदविद्वांसो वेदोक्तेषु व्यवस्थिताः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
द्रौपद्यु उवाच
दुर्लभामभिमन्वानो मां वीरैरभिरक्षिताम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
दुर्लभैश्वर्यतां प्राप्तो निन्दितः शत्रुतां व्रजेत् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ||
९६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
दुर्लभो दृश्यते ह्यस्य विनिपातो महार्णवे ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
दुर्लभो वै सुहृच्छ्रोता दुर्लभश्च हितः सुहृत् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
दुर्लभो हि जय़स्तेषां सङ्ग्रामे रिपुसूदन |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
दुर्लभो हि मनुष्येन्द्र नरः प्रत्यवमर्शवान् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
युधिष्ठिर उवाच
दुर्लभो हि सुहृच्छ्रोता दुर्लभश्च हितः सुहृत् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
कृशतनुरु उवाच
दुर्लभोऽप्यथ वा नास्ति योऽर्थी धृतिमिवाप्नुय़ात् |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्लभ्यमपि चैवान्नं दीय़तामिति सोऽव्रवीत् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
दुर्वलं खादितैर्मूलैराखुना विलवासिना ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
दुर्वलं दुर्वलं पूर्वं गृहस्येव विनश्यति ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
दुर्वलं वलवन्तं च भागिनं भजते सुखम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
दुर्वलं वलवन्तो हि मत्स्यं मत्स्या विशेषतः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
दुर्वलश्च यथा राजन्स्रोतसा ह्रिय़ते नरः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
१४
भीम उवाच
दुर्वलश्चानुपाय़ेन वलिनं योऽधितिष्ठति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
दुर्वलस्य कुतः प्रज्ञा पुरस्तादनुदाहृता ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
दुर्वलस्य हि यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्वला हि वलीय़ांसो विप्रा हि व्रह्मतेजसा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
दुर्वलांस्तात वुध्येथा नित्यमेवाविमानितान् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
दुर्वलाः क्लेशिताः स्मेति यद्व्रवीथेतरेतरम् |
२ क