शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
उवास हिमवत्पृष्ठे पाराशर्यो महामुनिः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
उवाह चैनान्सगणांस्तथैव; घटोत्कचः पर्वतनिर्झरेषु ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
उवाह भगवान्वाय़ुः शुष्कपर्णचय़ानिव ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
उवाह भार्यां यशसा ज्वलन्तीं; यस्यां जज्ञे रौक्मिणेय़ो महात्मा ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
उवाह मध्येन रणाजिरं भृशं; भय़ावहा जीवमृतप्रवाहिनी ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
उवाह मां ततः शीघ्रं हिरण्यपुरमन्तिकात् |
१५ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
उवाह रथिनां श्रेष्ठः पार्थः परपुरञ्जय़ः ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
उशद्गवः शतरथो देवराजो जय़द्रथः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
उशनसो दुहिता देवय़ानी वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्ठा नाम |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
उशना तु तदोवाच जठरस्थो महामुनिः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
उशना तु समुद्विग्नो निलिल्ये जठरे ततः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
उशना दूरतस्तस्य वभौ ज्ञात्वा चिकीर्षितम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
उशना प्राप तद्धीमान्गतिमिष्टां महामुनिः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
उशना योगसिद्धात्मा शूलाग्रे प्रत्यदृश्यत ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
उशना वृहस्पतिर्व्यासश्च्यवनः काश्यपो ध्रुवः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
उशना वृहस्पतिश्चैव यदोत्पन्नौ भविष्यतः |
४२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
उशना वेद यच्छास्त्रं तत्रैतद्विहितं विभो ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
उशना वेद यच्छास्त्रं देवासुरगुरुर्द्विजः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद वृहस्पतिः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
गङ्गो उवाच
उशना वेद यच्छास्त्रमय़ं तद्वेद सर्वशः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
उशनाश्चाथ गाथे द्वे प्रह्रादाय़ाव्रवीत्पुरा ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
उशीनर कपोते ते यदि स्नेहो नराधिप |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
उशीनरं द्विजश्रेष्ठो गालवः प्रत्यपूजय़त् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
उशीनरं प्रतिग्राह्य गालवः प्रय़यौ वनम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
उशीनरः प्रतिवचो ददौ तस्य नराधिपः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
उशीनरः शतरथः कङ्को दुलिदुहो द्रुमः ||
१७३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
उशीनरश्च विक्रान्तो वृष्णय़स्ते प्रकीर्तिताः ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
उशीनरस्य पुत्रोऽय़ं तस्माच्छ्रेष्ठो हि नः शिविः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
उशीनरस्य राजर्षेः सत्यसन्धस्य धीमतः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
उशीनरो विष्वगश्वो नृगश्च; भगीरथो विश्रुतो यौवनाश्वः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
उशीनरो वै धर्मात्मा तस्माद्भोजाः सय़ादवाः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
उशीनरो वै यत्रेष्ट्वा वासवादत्यरिच्यत ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
उशीरवीजं मैनाकं गिरिं श्वेतं च भारत |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
उशीरवीजे विप्रर्षे यत्र जाम्वूनदं सरः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
उषद्गुः सह सोदर्यैः परिव्याधश्च वीर्यवान् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
उषितं शङ्कमानेन प्रमादं परिरक्षता |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
उषितश्च सहास्माभिर्यावन्नासीद्धनञ्जय़ः ||
२८ ग
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
उषितस्त्वं सुविश्रान्तो मार्कण्डेय़ व्रवीहि मे ||
११७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
अम्वो उवाच
उषिता ह्यन्यथा वाल्ये पितुर्वेश्मनि तापसाः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
अर्जुन उवाच
उषिताः स्म महाराज सुखं तव निवेशने |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
उषिताः स्म वने वासं प्रतिकर्म चिकीर्षवः |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
उषिताः स्म सुखं नित्यं भवता परिपालिताः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
उषिताः स्मः सुखं सर्वे सर्वकामैः सुपूजिताः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
उषितानि मय़ा राजन्स्मरता द्यूतजं कलिम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
उषिताश्च वने कृच्छ्रं यत्र द्वादश वत्सरान् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
उषितास्मि तवागारे दीर्घकालमहिंसिता |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
उषितास्मि सुखं वीर त्वय़ि सत्यपराक्रमे |
५५ क
विराट पर्व
अध्याय
२
अर्जुन उवाच
उषितास्मीति वक्ष्यामि पृष्टो राज्ञा च भारत ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२८
धृतराष्ट्र उवाच
उषितो हि महावाहुरिन्द्रलोके धनञ्जय़ः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
उषितोऽस्मि सुखं राजन्कन्यया परितोषितः ||
२१ ख