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शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
उषितौ समय़े व्रह्मंश्चिन्त्यतामत्र साम्प्रतम् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दनः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा च महाभागास्तस्मिन्सत्रे यथाविधि |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा च वने वासं व्राह्मणैः सह संश्रितः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा तत्र कौन्तेय़ः संवत्सरपराः क्षपाः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा तत्र रामस्तु सम्पूज्याश्रमवासिनः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
उषित्वा द्वादश समाः शूद्रकर्मेह गच्छति ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
उषित्वा पञ्च वर्षाणि सहस्राक्षस्य वेश्मनि |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा रजनीं तत्र माधवः परवीरहा |
९४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा रजनीमेकां स्नात्वा च विधिवत्तदा ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
उषित्वा रजनीमेकामग्निष्टोमफलं लभेत् ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा शर्वरीः श्रीमान्पञ्चाशन्नगरोत्तमे |
५ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वेह यथाकामं यथाश्रद्धं विहृत्य च |
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
उषित्वेह विशल्यस्त्वं सुखं स्वे वेश्मनि प्रभो |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
उष्ट्रवामीभिरप्यन्ये सदश्वैश्च महाजवैः ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
उष्ट्रवामीस्त्रिशतं च पुष्टाः पीलुशमीङ्गुदैः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
उष्ट्रस्य सुमहद्वृत्तं तन्निवोध युधिष्ठिर ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
उष्ट्राणां क्रोशतां चैव हय़ानां हेषतामपि ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
कीट उवाच
उष्ट्राश्वतरय़ुक्तानि यानानि च वहन्ति माम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
व्रह्मो उवाच
उष्ट्रेषु यदि वा गोषु खरेष्वश्वेषु वा पुनः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
उष्ट्रय़ुक्तं समारूढौ भीष्मद्रोणौ जनार्दन |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
उष्णं नवं प्रपास्यामि फेनिलं रुधिरं वहु ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
उष्णः शीतः सुखो दुःखः स्निग्धो विशद एव च |
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
उष्णः शीतः सुखो दुःखः स्निग्धो विशद एव च |
४९ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
उष्णतोय़वहा गङ्ग शीततोय़वहापरा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
उष्णमश्रु विमुञ्चन्तस्तं विहाय़ महीपतिम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
उष्णां वैतरणीं महानदी; मवगाढोऽसिपत्रवनभिन्नगात्रः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
उष्णात्परः प्रावरकः प्रावरादन्धकारकः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
उष्णानि कृष्ण वर्तन्ते गच्छामो यमुनां प्रति ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च स विप्रस्तपसि स्थितः |
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
उष्णार्तो हि नरो यद्वज्जलधाराः प्रतीच्छति |
१०० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
उष्णीनाभो नभोदश्च विश्वाय़ुर्दीप्तिरेव च ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
उष्णीषकमठच्छन्नं पताकाफेनमालिनम् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
उष्णीषफेनवसनां निष्कीर्णान्त्रसरीसृपाम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
उष्णीषवान्यथा वस्त्रैस्त्रिभिर्भवति संवृतः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
उष्णीषाणि निय़च्छन्तः पुण्डरीकनिभैः करैः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
उष्णीषिणे सुवक्त्राय़ सहस्राक्षाय़ मीढुषे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
उष्णीषिणे सुवक्त्राय़ सहस्राक्षाय़ मीढुषे |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
उष्णीषिणो मुकुटिनः कम्वुग्रीवाः सुवर्चसः |
८९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
उष्णीषिणो मुकुटिनश्चारुवक्त्राः स्वलङ्कृताः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
उष्णीषे पर्यगृह्णीतां माद्रीपुत्रावुभौ तदा ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
उष्णीषैरपविद्धैश्च चामरव्यजनैरपि ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
उष्णीषैरपविद्धैश्च पताकाभिश्च सर्वषः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
श्रीकृष्ण उवाच
उष्णीषैर्मुकुटैः स्रग्भिश्चूडामणिभिरम्वरैः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
उष्णीषैश्च तथा छिन्नैः प्रविद्धैश्च ततस्ततः ||
७१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
उष्णे वा यदि वा शीते रात्रौ वा यदि वा दिवा |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
उष्णेन वाध्यते शीतं शीतेनोष्णं च वाध्यते ||
३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
उष्णेन वाध्यते शीतं शीतेनोष्णं प्रवाध्यते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
उष्य द्वादश वर्षाणि पुष्करे निय़तः शुचिः |
५६ क