वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
उष्य द्वादशरात्रं तु कृतात्मा भवते नरः ||
२५ ग
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
उष्य द्वादशरात्रं तु निय़तो निय़ताशनः |
५९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
उष्य सौवीरकन्याभिः श्लाघस्वार्थैर्यथा पुरा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
उष्यतां मय़ि चेत्युक्त्वाचेतय़त्स ततः पुनः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
उष्यतां यावदुत्साहो भुज्यतां यावदिष्यते ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
उष्यतां स्वागतं चेति प्रीतिमांश्चाभवद्भृशम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
उष्यैकां रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
उस्रां जुष्टां मिषतीं विश्वतोय़ा; मिरां वज्रीं रेवतीं भूधराणाम् |
९४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
उह्यमानं निमज्जन्तमप्लवे कालसागरे |
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
उह्यमानः स धर्मेण धर्मे वहुभय़च्छले ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
उह्यमानमिवाकाशे विमानं पाण्डुरैर्हय़ैः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
उह्यमानश्च कृष्णेन वाय़ुनेव वलाहकः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
उह्यमानश्च तुष्टाव तदा राजन्सरस्वतीम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
उह्यमाना यय़ुः शीघ्रं महदध्वानमल्पवत् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
उह्यमाना रथाश्वैस्ते पत्तय़श्च जिघांसवः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
उह्यमानास्तथा मेघैर्वाय़ुना च मनीषिणः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
उह्यमानास्तु ते राजन्वह्वशोभन्त वाय़ुना |
२४ क