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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
उच्छिष्टो न स्पृशेच्छीर्षं सर्वे प्राणास्तदाश्रय़ाः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
उच्छिष्टोत्सर्जनं चैव दूरे कार्यं हितैषिणा ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
उच्छीर्षतश्च कृष्णस्य निषसाद वरासने ||
६ ख
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
उच्छेत्तारः कुलं कृत्स्नमृते रामजनार्दनौ ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
उच्छेदनिष्ठा नेहास्ति भावनिष्ठा न विद्यते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
उच्छेषपरिशेषं हि तान्भोजय़ युधिष्ठिर ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
उच्छैःश्रवाः सोऽश्वराजो यन्मिथ्या न कृतो मम |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
उच्छैश्चाप्यवदन्रात्रौ नीचैस्तत्राग्निरज्वलत् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
उच्छ्राय़ा विनिपातान्ता भावोऽभावस्थ एव च ||
१०० ग
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
उच्छ्रितं चातिशृङ्गं च महापाषाणय़ोधिनौ |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
उच्छ्रिता काञ्चने दण्डे पताकाभिरलङ्कृता |
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
उच्छ्रितांस्तु भुजान्केचिन्नावुध्यन्त शरैर्हृतान् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
उच्छ्रितानाश्रय़ेत्स्फीतान्नरेन्द्रानचलोपमान् |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
उच्छ्रितेव रथे माय़ा ध्वजय़ष्टिरदृश्यत ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
उच्छ्रित्य केतुं विनदन्महात्मा; स्वय़ं विगृह्यार्जुनमाससाद ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
उच्छ्रित्य मकरं केतुं व्यात्ताननमलङ्कृतम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
उच्छ्रित्य वाहू दुःखार्तः सस्वरं प्ररुरोद ह ||
९४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
उच्छ्रित्य वाहू दुःखार्ता ताश्चान्याः प्रापतन्भुवि ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
उच्छ्वासमात्रमपि चेद्योऽन्तकाले समो भवेत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५२
नाग उवाच
उच्यतां द्विज यत्कार्यं यदर्थं त्वमिहागतः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
स्कन्द उवाच
उच्यतां यन्मय़ा कार्यं भवतीनामथेप्सितम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
उच्यतां स्वागतमिति वाचोऽश्रूय़न्त सर्वशः ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
उच्यतामिति तद्वत्सा यद्वः कार्यं प्रिय़ं मय़ा ||
३४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
उच्यमानं च यः श्रेय़ो गृह्णीते नो हिताहिते |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
उच्यमानं महावाहो न मे विप्राग्र्य रोचते ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
उच्यमानं मय़ा सम्यक्तदेकाग्रमनाः शृणु ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
उच्यमानस्तथापि स्म भूय़ एवाभ्यभाषत |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
उच्यमानानि मुख्यानां हुतानां जातवेदसि ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
उच्यमानो न गृह्णीषे मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
उच्यमानो महाराज वन्धुभिर्हितकाङ्क्षिभिः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३२
भीष्म उवाच
उच्यमानोऽपि लोकेन वहु तत्तदचिन्तय़न् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
उच्यमानोऽसकृत्प्रेष्यैर्व्रह्महन्निति भारत |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
उज्जगारारविन्दाक्षो व्रह्मणः पश्यतस्तदा ||
३६ ग
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
उज्जहार वलाद्व्रह्मन्सवनं सवनौकसम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
उज्जह्रुरुदरात्तस्याः स्त्रीपुमांसं च मानुषम् ||
४९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
उज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टिषेणस्य चाश्रमे |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
उज्जिहीर्षुर्निमज्जन्तं स्मरन्सत्पुरुषव्रतम् ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
उज्जिहीर्षुस्तदा शल्यः प्राय़ात्पाण्डुचमूं प्रति ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
उज्जय़न्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरो महान् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
उज्जय़न्ते स्म तप्ताङ्गो नाकपृष्ठे महीय़ते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
उज्जय़ोनिरदापेक्षी नारदी च महानृषिः |
५८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
उञ्छं मूलं फलं शाकमुदपात्रं तपोधनाः |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
उञ्छंस्तदा शुक्लपक्षे मध्यं तपति भास्करे |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
उञ्छन्ति ये समीपस्थाः स्वभावनिय़तेन्द्रिय़ाः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
उञ्छन्ति सततं तस्मिन्व्राह्मं फेनोत्करं शुभम् |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
उञ्छमप्राप्तवानेव सार्धं परिजनेन ह ||
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
उञ्छमुञ्छन्ति धर्मज्ञाः शाकुनीं वृत्तिमास्थिताः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
उञ्छवृत्तिरृषिः कश्चिद्यज्ञे यज्ञं समादधे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८४
भृगुरु उवाच
उञ्छवृत्तिर्गृहस्थो यः स्वधर्मचरणे रतः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
उञ्छवृत्तिर्द्विजः कश्चित्कापोतिरभवत्पुरा ||
२ ख