शान्ति पर्व
अध्याय
३५१
सूर्य उवाच
उञ्छवृत्तिव्रते सिद्धो मुनिरेष दिवं गतः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
उञ्छवृत्तिस्तु सव्रीडो वभूव द्विजसत्तमः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
उञ्छवृत्तेः पुरावृत्तं यज्ञार्थे व्राह्मणस्य ह ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
उञ्छवृत्तेर्यथावृत्तं कुरुक्षेत्रनिवासिनः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
उञ्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिनः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
उञ्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिनः ||
१९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
उटजं वा तथा ह्यस्य नानाविधसरूपता ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
उटजस्थस्तु तं विप्रः प्रत्युवाच सुदर्शनम् |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
उटजात्तु ततस्तस्मान्निश्चक्राम स वै द्विजः |
७६ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
उडुपप्लवसन्तारो यत्र नित्यं भविष्यति |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
उड्डीनमवडीनं च प्रडीनं डीनमेव च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
उत जाताः सुनक्षत्रे सुतीर्थाः सुमुहूर्तजाः ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
युधिष्ठिर उवाच
उत तत्रापि नानात्वं तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
उत ते वेद कर्माणि न त्वां परिभवाम्यहम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
उत यज्ञा उताय़ज्ञा मखं नार्हन्ति ते क्वचित् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
उत वा मां न जानासि प्लवन्ह्रद इवाल्पवः |
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
उत वालाय़ पाण्डित्यं पण्डिताय़ोत वालताम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
कहोड उवाच
उत वाविदुषो विद्वान्पुत्रो जनक जाय़ते ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
उत शल्य विजानीहि हन्त भूय़ो व्रवीमि ते |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
उत शल्य विजानीहि हन्त भूय़ो व्रवीमि ते |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
उत शल्य विजानीहि हन्त भूय़ो व्रवीमि ते |
५७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
उत शल्य विजानीहि हन्त भूय़ो व्रवीमि ते |
६७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
उत सन्तमसन्तं च वालं वृद्धं च सञ्जय़ |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
उतथ्यं तु महाभागं तत्कृतेऽवरय़त्तदा ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
उतथ्यः सुमहातेजा यत्तच्छृणु नराधिप ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
उतथ्यपुत्रं गर्भस्थं निर्भर्त्स्य भगवानृषिः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
उतथ्यमव्रवीद्वाक्यं नातिहृष्टमना इव ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
उतथ्यस्य यवीय़ांस्तु पुरोधास्त्रिदिवौकसाम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
उतथ्येऽन्तर्हिते चैव कदाचिद्देवमाय़या |
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
उतावलं वलीय़ांसं धाता प्रकुरुते वशे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
कहोड उवाच
उतावलस्य वलवानुत वालस्य पण्डितः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
उताहो त्वं मन्यसे सर्वमेव; राज्ञां युद्धे वर्तते धर्मतन्त्रम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
उताहो नाममात्रं वै सुवर्णष्ठीविनोऽभवत् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
उताहो वाप्युच्चतां नीचतां वा; तूष्णीं भूतेष्वथ सर्वेषु चाद्य ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
उताहो सर्वसैन्येन धर्मराजः सहानुजः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
उताहो स्विद्भवेद्राजा नलः परपुरञ्जय़ः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
२०९
व्राह्मण उवाच
उत्कर्षति जलात्कश्चित्स्थलं पुरुषसत्तमः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्कर्षति धनुःश्रेष्ठं गाण्डीवमशनिस्वनम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
उत्कर्षार्थं प्रय़तते नरः पुण्येन कर्मणा ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्कृत्तशिरसश्चान्यान्विजग्धान्मृगपक्षिभिः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
उत्कृत्य कवचं यस्मात्कुण्डले विमले च ते |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
उत्कृत्य च शिरांस्युग्रो वाहूनपि सभूषणान् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
कर्ण उवाच
उत्कृत्य तु प्रदास्यामि कुण्डले कवचं च ते |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
उत्कृत्य वक्षः पतितस्य भूमा; वथापिवच्छोणितमस्य कोष्णम् |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
उत्कृत्य विमनाः स्वाङ्गात्कवचं रुधिरस्रवम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
उत्कृष्ट एव तु ग्राहः सोऽर्जुनेन यशस्विना |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
उत्कृष्टसिंहनादाश्च सुव्रह्मण्यो भविष्यति ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
उत्कृष्टैः सिंहनादैश्च गर्जितेन च धन्विनाम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
उत्कोचिनां मृषोक्तीनां वञ्चकानां च या गतिः |
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
उत्कोचैर्वञ्चनाभिश्च कार्याण्यनुविहन्ति च ||
५१ ख