कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
ततः पूर्णाय़तोत्सृष्टैरन्योन्यं सुकृतव्रणौ |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
ततः पूर्णाय़तोत्सृष्टैर्मांसशोणितभोजनैः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
ततः पूर्वव्यतीतानि कथय़ेते स्म तावुभौ |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पूर्वापरे सन्ध्ये समीक्ष्य भगवानृषिः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पूर्वाह्णसमय़े शिविरादेत्य सञ्जय़ः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
ततः पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पूर्वोत्तरो वाय़ुः पवमानो यदृच्छय़ा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
ततः पृथिव्या गोप्तारं क्षत्रिय़ं दण्डधारिणम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
ततः पृथिव्या निर्दिष्टांस्तान्समानीय़ कश्यपः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय
१०१
देवा ऊचुः
ततः पृथिव्यां क्षीणाय़ां त्रिदिवं क्षय़मेष्यति ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ततः पृषत्कान्प्रववर्ष राजा; सूर्यो यथा रश्मिजालं समन्तात् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
ततः पृष्ट्वा यथान्याय़मन्योन्यं ते वनौकसः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पौण्ड्राधिपं वीरं वासुदेवं महावलम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
५६
वृहदश्व उवाच
ततः पौरजनः सर्वो मन्त्रिभिः सह भारत |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पौरजनाः सर्वे सागरोद्धूतनिःस्वनाः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
ततः पौरा महाराज माता काली च मे शुभा |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
ततः पौराः समाजग्मुर्भय़शोकपरिप्लुताः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततः पौरुषमास्थाय़ मद्रराजमपीडय़त् ||
१४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रकाशमभवज्जगत्सर्वं महीपते |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रकाशमासाद्य पुनर्युद्धमवर्तत |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रकाशे शिविरे खड्गेन पितृनन्दनः |
१०४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
ततः प्रकीर्णं सुमहद्वलं तव; प्रदारितं सेतुरिवाम्भसा यथा |
६४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रकुपितो राजा तमक्षेणाहनद्भृशम् |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
ततः प्रकृतिमापन्ना देवा लोकास्तथर्षय़ः |
१२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
ततः प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नृपते नृपम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रकृतय़ः सर्वाः पुरस्कृत्य पुरोहितम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रकृतय़ः सर्वाः पौरजानपदास्तथा |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रकृतय़ः सर्वाः शाल्वेभ्योऽभ्यागता नृप |
३ क
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
ततः प्रक्षालनं कृत्वा समधिश्रित्य वाहुकः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रक्षाल्य पादौ सा विश्रान्तं मुनिमव्रवीत् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
ततः प्रक्षाल्यमानेषु मत्स्येषु विमले जले |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
ततः प्रक्षीय़माणेषु तेष्वण्डेष्वण्डजोऽपरः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रगणय़ामासुः कस्य वारोऽद्य भोजने |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रगृह्य विपुलां शतघण्टां विभीषणः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
ततः प्रचक्रे वपुरन्यदल्पं; प्रवेष्टुकामोऽग्निमभिप्रशाम्य ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
ततः प्रचोदिता राज्ञा वनं गत्वास्य मन्त्रिणः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रजज्ञे तुमुलः कुरूणां; निशामुखे घोरतरः प्रणादः ||
१२९ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रजज्ञे निनदः सूतानां युज्यतामिति |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रजज्वाल किरीटमाली; क्रोधेन कक्षं प्रदहन्निवाग्निः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रजज्वाल परेण मन्युना; पदाहतो नागपतिर्यथा तथा |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रजविताश्वेन विधिवत्कल्पितेन च |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रजविताश्वेन विधिवत्कल्पितेन च |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
ततः प्रजानां पतय़ः प्राभवन्नेकविंशतिः ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रजापतिः सर्वा विससर्जाथ देवताः |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
ततः प्रजास्ता वहुला वभूवुः; कालातिपातान्मरणात्प्रहीणाः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रज्ञावय़ोवृद्धं पाञ्चाल्यः स्वपुरोहितम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रज्ञास्त्रमादाय़ मोहनास्त्रं व्यशातय़त् ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रज्वलिते शुक्रे शार्ङ्गकास्ते सुदुःखिताः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
ततः प्रज्वलितैर्वाणैः सर्वतः सोपचीय़त |
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
ततः प्रज्वाल्य विधिवज्जुहाव परमं हविः |
२६ क