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आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
ऋचो वह्वृचमुख्यैश्च प्रेर्यमाणाः पदक्रमैः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
ऋजवः शमसम्पन्नाः शिष्टाचारा भवन्ति ते ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
भीष्म उवाच
ऋजवो नाकपृष्ठे वै शुद्धात्मानः प्रतिष्ठिताः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
ऋजु पश्यंस्तथा सम्यगाश्रमाणां परां गतिम् |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
ऋजु पश्यति मेधावी पुत्रवत्पाति नः सदा ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
ऋजु पश्यति यः सर्वं चक्षुषानुपिवन्निव |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
ऋजुः प्रणिहितो गच्छंस्त्रसस्थावरवर्जकः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
ऋजुः सुनिशितः पीतः साय़कोऽस्य स्रुवो महान् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
ऋजुना प्रतिय़ुध्येथा न ते स्याद्विजय़ो ध्रुवम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभय़स्य च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
ऋजुर्मृदुरनृशंसः क्षमावा; न्स वै विप्रो नेतरः पापकर्मा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
ऋजुश्च सत्यवादी च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
ऋजुस्तु योऽर्थं त्यजति तं सुखं विद्धि भिक्षुकम् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
ऋजुय़ुद्धेन विक्रान्ता हन्तुं युष्माभिराहवे ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
ऋजुय़ोधी हतो राजा धार्तराष्ट्रो नराधिपः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
ऋजूनां शमनित्यानां स्थितानां स्वेषु कर्मसु |
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
ऋजून्येव विशुद्धानि सर्वे शस्त्राण्यधारय़न् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
ऋजून्सतः सत्यशीलान्सर्वभूतहिते रतान् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
ऋजोर्मृदोर्वदान्यस्य ह्रीमतः सत्यवादिनः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
ऋजोर्मृदोर्वदान्यस्य ह्रीमतः सत्यवादिनः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
ऋणं तत्प्रतिमुञ्चानो न राज्ये मन आदधे ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
ऋणं धारय़माणस्य कुतः सुखमनीहय़ा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
ऋणकर्ता च यो राजन्यश्च वार्धुषिको द्विजः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
ऋणमुन्मुच्य देवानामृषीणां च तथैव च |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
ऋणमेतत्प्रवृद्धं मे हृदय़ान्नापसर्पति |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
ऋणवन्तो यदा मर्त्याः पितृदेवद्विजातिषु ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
ऋणवाञ्जाय़ते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
ऋणशेषोऽग्निशेषश्च शत्रुशेषस्तथैव च |
५८ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
कश्यप उवाच
ऋणिनं प्रति यच्चैव राज्ञा ग्रस्तस्य चापि यत् ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय २२०
देवा ऊचुः
ऋणिनो मानवा व्रह्मञ्जाय़न्ते येन तच्छृणु |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १११
पाण्डुरु उवाच
ऋणैश्चतुर्भिः संय़ुक्ता जाय़न्ते मनुजा भुवि |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
ऋत आत्मानमेवेति ततो रुद्रं भजाम्यहम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
ऋतं व्रुवन्गुरवे कर्म कुर्व; न्न व्राह्मणश्च्यवते व्रह्मलोकात् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतं सत्यं च विख्यातमृषिसिंहेन चिन्तितम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
ऋतं सत्यं विदितं वेदितव्यं; सर्वस्यात्मा जङ्गमं स्थावरं च |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतः शल्यो मद्रराजो वाह्लिकश्च महारथः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
ऋतधामा ततो विप्रैः सत्यश्चाहं प्रकीर्तितः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
ऋतमेकाक्षरं व्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
ऋतमेव हि पूर्वास्ते वहन्ति पुरुषोत्तमाः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
वदान्य उवाच
ऋतवः कालरात्रिश्च ये दिव्या ये च मानुषाः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
ऋतवः षट्च देवेन्द्रं मूर्तिमन्त उपस्थिताः |
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
ऋतवः सर्वपुष्पैश्च व्यकिरन्त महाद्भुतैः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतवश्च ग्रहाश्चैव ज्योतींषि च विशां पते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
ऋतवश्च सुखाः सर्वे भवन्त्युत निरामय़ाः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
ऋतवश्चापि युज्यन्ते तथा संवत्सरा अपि |
२ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतवाक्च सुवाक्चैव वृहदश्व ऋतावसुः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
ऋतवागनहंवादी निर्द्वन्द्वः शमकोविदः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
ऋतवादी सदा च स्याज्ज्ञाननित्यश्च यो नरः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
ऋतवादी सदा च स्याद्दानशीलश्च मानवः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
ऋतवादी सदा च स्यान्निय़तश्च सदा भवेत् ||
७ ख