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शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
ऋतवो नसुखाः सर्वे भवन्त्यामय़िनस्तथा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
ऋतसोपानतीरेण विहिंसातरुवाहिना ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतस्य दातारमनुत्तमस्य; निधिं निधीनां चतुरन्वय़ानाम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
ऋता व्रह्मसुता सा मे सत्या देवी सरस्वती ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
ऋता सत्यामराजय़्या लोकानामात्मसञ्ज्ञिता ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
ऋतां च कुरुते वुद्धिं स धर्मेण विरोचते ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
ऋतां मैत्रीं प्रभाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
ऋतावथ महर्षिः स सम्वभूव तय़ा सह |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतावृतौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतावृतौ राजपुत्रि स्त्रिय़ा भर्ता यतव्रते |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
यय़ातिरु उवाच
ऋतुं वै याचमानाय़ा न ददाति पुमान्वृतः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
यय़ातिरु उवाच
ऋतुं वै याचमानाय़ा भगवन्नान्यचेतसा |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
ऋतुः संवत्सरस्तिथ्यः शीतोष्णे च प्रिय़ाप्रिय़े |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
ऋतुः संवत्सरो मासः पक्षः सङ्ख्यासमापनः |
१३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतुकालमनुप्राप्तं स्नाता पुंसवने शुचिः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतुकालश्च सम्प्राप्तो न च मेऽस्ति पतिर्वृतः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
ऋतुकालाभिगामी च धर्मपत्नीषु यः सदा |
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
ऋतुकालाभिगामी च निय़तो निय़ताशनः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
ऋतुकाले ततः स्नाता कदाचिद्वासुकेः स्वसा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतुकाले ततो ज्येष्ठां वधूं तस्मै न्ययोजय़त् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
ऋतुकाले तथा नारी ऋतुमेव प्रतीक्षते |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
ऋतुकाले तु धर्मात्मा पत्नीं सेवेत नित्यदा ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते देवय़ानी वराङ्गना |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते भर्त्रास्म्यद्य समागता ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
ऋतुकाले स्वकां पत्नीं गच्छतां या मनस्विनाम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
ऋतुकालेऽभिपतितो मदय़न्त्या निवारितः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
ऋतुद्वारं वर्षमुखमाहुर्वेदविदो जनाः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णं जना राज्ञे भीमाय़ प्रत्यवेदय़न् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णं महाराज सुदेवो व्राह्मणस्तदा ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णं महीपालं सहवार्ष्णेय़वाहुकम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णं वचो व्रूहि पतिमन्यं चिकीर्षती |
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णं स राजानमुपतस्थे सुदुःखितः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णस्ततो राजा वाहुकं कार्यगौरवात् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णस्तु राजेन्द्र वाहुकस्य हय़ज्ञताम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ७३
केशिन्यु उवाच
ऋतुपर्णस्य चार्थाय़ भोजनीय़मनेकशः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णस्य नगरं प्राविशद्दशमेऽहनि ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णस्य नगरे सहवार्ष्णेय़जीवलः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णस्य पुरुषो वाहुको नाम नामतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णस्य वै काममात्मार्थं च करोम्यहम् ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णे गते राजन्वार्ष्णेय़सहिते नृपे |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णे प्रतिगते नलो राजा विशां पते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ७२
वाहुक उवाच
ऋतुपर्णेन सारथ्ये भोजने च वृतः स्वय़म् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णोऽपि राजा स धीमान्सत्यपराक्रमः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णोऽपि शुश्राव वाहुकच्छद्मिनं नलम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
ऋतुमासार्धमासांश्च दिवसांस्तु क्षणांस्तथा ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
ऋतुरृतुकरः कालो मधुर्मधुकरोऽचलः |
७१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
ऋतुर्मातुः पितुर्वीजं दैवतं परमं पतिः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
ऋतुवीर्यस्तपोधैर्यो ह्यव्दगुह्योरुपादवान् ||
५० ख