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आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतुश्च तस्याः पत्न्या मे न मोघः स्यादिति प्रभुः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
ऋतुस्नाता च साश्वत्थं त्वं च वृक्षमुदुम्वरम् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
देवशर्मो उवाच
ऋतूंस्तानभिजानीहि ते ते जानन्ति दुष्कृतम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
ऋतूनुत्पातान्विविधान्यद्भुतानि; मेघान्विद्युत्सर्वमैरावतं च |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय ३४
देवा ऊचुः
ऋते कद्रूं तीक्ष्णरूपां देवदेव तवाग्रतः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
ऋते कृष्णान्महाभागात्पाण्डवाद्वा धनञ्जय़ात् ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय १३९
देवा ऊचुः
ऋते गुरुमधीता हि सुखं वेदास्त्वय़ा पुरा ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
ऋते घटोत्कचाद्राजन्राक्षसेन्द्रान्महावलात् |
८५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
ऋते घटोत्कचाद्वीराद्राक्षसेन्द्रान्महावलात् ||
१०० ग
शल्य पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
ऋते च जीविताद्वीर युद्धे किं कुर्म ते प्रिय़म् ||
५३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
ऋते च धनमश्वानां नावाप्तिर्विद्यते तव |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
ऋते च लवणं भोज्यं श्यामाकान्नं ददौ प्रभुः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
ऋते च विदुरं सर्वे यूय़ं वध्या महात्मनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
ऋते तमेकं पुरुषं वासुदेवं सनातनम् |
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
ऋते तस्मान्नरव्याघ्रात्कुन्तीपुत्राद्धनञ्जय़ात् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ५३
नल उवाच
ऋते तां पार्थिवसुतां भवतामेव तेजसा ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
ऋते त्वा पुरुषव्याघ्र शपे सत्येन चानघ ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र देवतुल्यपराक्रम |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र राक्षसाद्वा घटोत्कचात् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
८३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
ऋते त्वां राक्षसश्रेष्ठ सर्वविद्यासु पारगम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
च्यवन उवाच
ऋते त्वां विवुधांश्चान्यान्कथं वै नार्हतः सवम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १०२
देवा ऊचुः
ऋते त्वां हि महाभाग तस्मादेनं निवारय़ ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
कपिल उवाच
ऋते त्वागमशास्त्रेभ्यो व्रूहि तद्यदि पश्यसि ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
ऋते त्वामिति मे वुद्धिस्त्वमद्य जहि सूतजम् ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
ऋते दधिघृतेनेह न यज्ञः सम्प्रवर्तते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
ऋते देवप्रसादाद्वा राजञ्ज्ञानागमेन वा |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
ऋते देवान्महेष्वासाद्वहुरूपान्महेश्वरात् ||
१५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
ऋते द्रोणं च भीष्मं च विदुरं च महामतिम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
ऋते न पुरुषेणेह स्त्री गर्भं धारय़त्युत |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
ऋते नाराय़णं देवं दैत्या नागोत्तमास्तथा |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
ऋते नाराय़णं देवं नरं वा जिष्णुमव्ययम् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
ऋते निय़ोगाद्विप्राणामेष मे समय़ः कृतः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ऋते पाण्डुसुतं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् |
७७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिकेऽस्यातिकाय़तः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
कुन्त्यु उवाच
ऋते प्रदानाद्वन्धुभ्यस्तव कामं करोम्यहम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
ऋते प्राय़गतं राजन्न्यस्तशस्त्रमचेतनम् |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
ऋते भीष्मं महावाहुं मां चापि मुनितेजसा ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २५९
व्रह्मो उवाच
ऋते मनुष्याद्भद्रं ते तथा तद्विहितं मय़ा ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
वासुदेव उवाच
ऋते महारथात्पार्थात्कुन्तीपुत्राद्धनञ्जय़ात् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ऋते महेन्द्रतनय़ं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् ||
९५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
ऋते रक्षां सुविस्पष्टां रक्षा लोकस्य धारणम् ||
४२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋते वनं महाभागास्तन्मानुज्ञातुमर्हथ ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
ऋते वर्षं न कौन्तेय़ जातु निर्वर्तय़ेत्फलम् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
ऋते वृकोदरात्पार्थात्स च नातिकृतश्रमः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
ऋते व्रह्मविदस्तात तपसा संशितव्रतात् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
ऋते व्रह्मविदां हेतोः किमन्यत्करवाणि ते ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
ऋते व्रह्मसमेभ्यश्च देवकल्पेभ्य एव च ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
ऋते शान्तनवाद्भीष्मात्कृष्णाद्वा देवकीसुतात् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
ऋते शान्तनवाद्भीष्मात्त्रिषु लोकेषु पार्थिव |
२१ क