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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
ऋते शान्तनवाद्भीष्मात्सत्यसन्धाज्जितेन्द्रिय़ात् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
ऋते सत्यमसन्त्याज्यं सत्ये ह्यमृतमाश्रितम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋते सेनाप्रणेतारं पृतना सुमहत्यपि |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
ऋते स्त्रिय़ं न पुरुषो रूपं निर्वर्तय़ेत्तथा ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
ऋते स्वय़म्भुवः कोऽन्यः श्राद्धेय़ं विधिमाहरेत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
ऋते ह्येकान्तिकश्रेष्ठात्त्वं चैवैकान्तिको मतः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
ऋतेऽतिथिं नरव्याघ्र मनसैतद्विचारय़ ||
९० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे; येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
ऋतेऽपि त्वय़ि दुःषन्त शैलराजावतंसकाम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय २०१
पितामह उवाच
ऋतेऽमरत्वमन्यद्वां सर्वमुक्तं भविष्यति |
२० क
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
ऋतेऽर्जुनं महावाहुं देवैरपि दुरासदम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतेऽस्थिभिर्दधीचस्य निहन्तुं त्रिदशद्विषः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
ऋतेऽस्मानस्मदर्थांस्तु भोगान्भुङ्क्ते भवान्यदि ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ११५
भृगुरु उवाच
ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय़ वै |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तदा स्म भरतर्षभ ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
ऋतौ निर्वर्तते रूपं तद्वक्ष्यामि निदर्शनम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
ऋत्वास्यः समवलशुक्लकृष्णनेत्रो; मांसाङ्गो द्रवति वय़ोहय़ो नराणाम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
ऋत्विक्पुरोहिताचार्या मृदुव्रह्मधरा हि ते |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
ऋत्विक्पुरोहिताचार्या ये चान्ये श्रुतसंमताः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
ऋत्विक्पुरोहिताचार्याः शिष्याः सम्वन्धिवान्धवाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान्कीदृशान्वर्जय़ेन्नृपः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान्सत्कृतैरभिपूजितान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान्सत्कृत्यानवमन्य च |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मन्त्रिभिश्चावृतं तदा ||
२८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
ऋत्विक्पुरोहितो मन्त्री दूतोऽथार्थानुशासकः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विक्षु कर्मव्यग्रेषु वितते यज्ञकर्मणि ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ४
सूत उवाच
ऋत्विक्ष्वथ सदस्येषु स वै गृहपतिस्ततः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
ऋत्विक्सदस्यैरिन्द्राग्नी हूय़मानाविवाध्वरे ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५०
आस्तीक उवाच
ऋत्विक्समो नास्ति लोकेषु चैव; द्वैपाय़नेनेति विनिश्चितं मे |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
विश्वामित्र उवाच
ऋत्विगस्तु ह्ययाज्यस्य यस्ते हरति पुष्करम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
ऋत्विगाचार्यसम्पन्नाः स्वेषु कर्मस्ववस्थिताः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
ऋत्विगासीत्तदा राजन्यज्ञे तस्य महात्मनः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
ऋत्विग्गुरुर्विवाह्यश्च स्नातको नृपतिः प्रिय़ः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विग्भिः सहितो भीष्मः सर्वैश्च कुरुपुङ्गवैः ||
५९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
ऋत्विग्भिरननुज्ञातः पङ्क्त्या हरति दुष्कृतम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
ऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च कुशलैर्यज्ञसंस्तरे ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
ऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च तथैव च पुरोहितैः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विग्भिर्व्रह्मकल्पैश्च भ्रातृभिश्च सहाच्युतः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विग्भिश्च सुहृद्भिश्च तथान्यैर्द्विजसत्तमैः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विग्भ्यः प्रददौ विद्वांश्चतुर्धा व्यभजंश्च ते ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
ऋत्विग्भ्यः ससदस्येभ्यो ये तत्रासन्समागताः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
ऋत्विग्वा यदि वाचार्यः सखा वात्यन्तसंस्तुतः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
ऋत्विजं नात्मना तुल्यं ददर्शेति हि नः श्रुतम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
ऋत्विजं मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुनन्दन |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
ऋत्विजः कुञ्जरास्तत्र वाजिनोऽध्वर्यवस्तथा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विजश्च समाहूता यथोक्तं वेदपारगाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
अम्वरीष उवाच
ऋत्विजश्चात्र के प्रोक्तास्तन्मे व्रूहि शतक्रतो ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विजश्चानय़ध्वं वै शतशश्च द्विजर्षभान् ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विजस्तमपर्यन्तं सुवर्णनिचय़ं तदा |
२३ क