आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
विक्रमेण मही प्राप्ता भरतेन महात्मना |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
विक्रमेण महीं कृत्स्नां जय़ेय़ं विपुलव्रत |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
विक्रमेण महीं लव्ध्वा प्रजा धर्मेण पालय़न् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
विक्रमेणानुरूपेण युध्येतां पुरुषर्षभौ ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रमेणार्जितान्भोगान्वृणीतं जीवितादपि ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
विक्रमेणार्जितान्भोगान्वृणीतं जीवितादपि ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
विक्रमेणैव कृष्णेन सगणः शातितो रणे ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
युधिष्ठिर उवाच
विक्रमेणोपसम्पन्नास्तेजोवलसमन्विताः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रमेणौजसा चैव वलेन च समन्वितः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
विक्रमैश्च महात्मानं वलवृत्रनिषूदनम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रमो येन वसुधा क्रोधान्निःक्षत्रिय़ा कृता ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
विक्रमो हि रणे तेषां न तथा दृश्यतेऽद्य वै ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
विक्रम्य घोरे तपसि व्राह्मणः संशितव्रतः |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
विक्रम्य निजघानाशु पुत्रान्पौत्रांश्च सर्वशः ||
४५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
विक्रम्य रथिनां श्रेष्ठ पाञ्चालान्सपदानुगान् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
विक्रम्य वशमानीय़ कामतो यत्समाचरेत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
विक्रम्य वारिता राजन्वीरेण कृतवर्मणा ||
५७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
विक्रान्तः सत्यवाक्क्षान्तो नृपो न चलते पथः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
विक्रान्तः सत्यवाग्धीरो भर्ता मम महाय़शाः |
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
विक्रान्तस्य च वीरस्य युद्धे प्रार्थय़तो यशः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
विक्रिय़न्ते स्वधर्मस्था वेदवादा यथाय़ुगम् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
विक्रिय़न्ते स्वधर्मस्थाः स्थावराणि चराणि च ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
विक्रिय़ां पश्य मे तीव्रां राजपुत्र्याः परन्तप |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
विक्रीडन्तौ सुवलिनौ मण्डलानि प्रचेरतुः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
धृतराष्ट्र उवाच
विक्रीडितं कुमारस्य स्कन्दस्येवासुरैः सह ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
विक्रीडितं कुमारेण यथानीकं विभित्सता ||
२५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
विक्रीडितं यथा सङ्ख्ये तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रीड्य तस्मिन्सुचिरमुत्ततारामितद्युतिः ||
५४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
विक्रीणन्तं च पण्यानि तुलाधारं ददर्श सः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
गौतम उवाच
विक्रीणातु तथा सोमं विसस्तैन्यं करोति यः ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
विक्रीणानः सर्वरसान्सर्वगन्धांश्च वाणिज |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रीणानश्च सर्वेभ्यः पाण्डवेभ्यः प्रय़च्छति ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
विक्रीतासु च ये पुत्रा भवन्ति पितुरेव ते ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
विक्रुष्टं विदुरेणादौ तदेतद्भय़मागतम् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
विक्रोशतां च सैन्यानामवधीत्तं यतव्रतम् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
विक्रोशन्ति नरा राजंस्तत्र तत्र स्म वान्धवान् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रोशन्प्राद्रवत्सर्वो द्वारकामभितः पुरीम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
विक्रोशमानश्चान्योन्यं जनो गां पर्यटिष्यति ||
८४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
विक्रोशमानान्सुभृशं दस्यून्नेष्यति सङ्क्षय़म् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
विक्रोशमाने हि मय़ि भृशमाचार्यगृद्धिनि |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
विक्रय़ं क्रय़मध्वानं भक्तं च सपरिव्ययम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
विक्रय़ं चाप्यपत्यस्य कः कुर्यात्पुरुषो भुवि ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
विक्रय़ं हीह सोमस्य गर्हय़न्ति मनीषिणः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
व्रह्मो उवाच
विक्रय़ार्थं हि यो हिंस्याद्भक्षय़ेद्वा निरङ्कुशः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
व्रह्मो उवाच
विक्रय़े चापहारे च ते दोषा वै स्मृताः प्रभो ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
विक्लवत्वं च नः प्राप्तमवलत्वं तथैव च ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
विक्लवोऽसि मय़ा ज्ञातस्ततस्ते दर्शितं जगत् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
विक्षतं चाय़सैर्वाणैर्मत्प्रय़ुक्तैरजिह्मगैः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
विक्षताश्च शितैः शस्त्रैरभ्यवर्तन्त तावकाः ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
विक्षरद्भिर्नदद्भिश्च निपतद्भिश्च वारणैः |
४१ क