chevron_left  ऋषिराश्रममागम्यarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
ऋषिराश्रममागम्य ममैतत्प्रोक्तवानिह ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
ऋषिरासीत्कृते तात तण्डिरित्येव विश्रुतः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
ऋषिरासीत्पुरा पुत्र वालधिर्नाम वीर्यवान् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
ऋषिरासीन्महान्पूर्वं तपोविद्यासमन्वितः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
ऋषिरासीन्महाभागो देवशर्मेति विश्रुतः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिरासीन्महावीर्यः कुणिर्गार्ग्यो महाय़शाः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
ऋषिरुग्रतपाः पार्थ विश्वामित्रः प्रतापवान् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
राजो उवाच
ऋषिरुग्रतपास्त्वं च तदाभूर्द्विजसत्तम ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
ऋषिरुग्रश्रवाश्चैव भार्गवश्च्यवनस्तथा ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
ऋषिरुद्दालकिर्दीक्षामुपगम्य ततः सुतम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
ऋषिरेवं महाभागस्त्वङ्गिराः प्राह धर्मवित् ||
५४ ग
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिरेष महातेजा नाराय़णसहाय़वान् |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिरेष महातेजाः पुरुषः शाश्वतोऽव्ययः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिर्गृत्समदो नाम शक्रस्य दय़ितः सखा |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
ऋषिर्दीर्घतमाश्चैव गौतमः कश्यपस्तथा |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय २२३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिर्द्रोणस्त्वमसि वै व्रह्मैतद्व्याहृतं त्वय़ा |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
आस्तीक उवाच
ऋषिर्द्वैपाय़नो यत्र पुराणस्तपसो निधिः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
ऋषिर्महान्महाभागो जमदग्निर्महाय़शाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
ऋषिर्मूलफलाहारो निय़तो निय़तेन्द्रिय़ः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
ऋषिर्मेधातिथिश्चैव ताण्ड्यश्चैव महानृषिः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महाय़शाः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
ऋषिर्वज्रस्तथाख्यातः शालङ्काय़न एव च ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भीष्म उवाच
ऋषिलोकं च सोऽगच्छद्भगीरथ इति श्रुतिः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
ऋषिवाक्यं च मन्वानः श्रुत्वा च निहतं सुतम् ||
१०९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
ऋषिवाक्यं निशम्याथ स वृत्रः सुमहावलः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
ऋषिश्च ऋषिपुत्रश्च नाहुषाङ्ग वहस्व माम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
ऋषिष्टुतां विष्णुपदीं पुराणीं; सुपुण्यतोय़ां मनसापि लोके |
९२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिसंसदि तं दृष्ट्वा सा नदी मुनिसत्तमम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिसिद्धगणं दृष्ट्वा विस्मय़ं ते परं यय़ुः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिसिद्धामरय़ुतं गन्धर्वाप्सरसां प्रिय़म् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
ऋषिस्तत्पूजय़न्वाक्यं पुत्रस्यामिततेजसः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
ऋषिस्तथा गालवोऽथाष्टकश्च; भरद्वाजोऽरुन्धती वालखिल्याः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
भीष्म उवाच
ऋषिस्तमाह देय़ा मे सुता तुभ्यं शृणुष्व मे |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
ऋषिस्तु नापचक्राम तस्मिन्धर्मपथे स्थितः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिस्त्वथ वचः श्रुत्वा चिन्तय़ामास धर्मवित् |
९ क
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिय़ज्ञेन महता यत्राक्षय़वटो महान् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
ऋषिय़ानेन दिव्येन मामुपैहि जगत्पते |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
ऋषी राक्षससत्रेण शाक्तेय़ोऽथ पराशरः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषी शमदमोपेतौ कृत्वा पूर्वाह्णिकं विधिम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
नारद उवाच
ऋषींश्च तोषय़ामास विधिदृष्टेन कर्मणा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
ऋषींश्च देवांश्च महासुरांश्च; त्रैविद्यवृद्धांश्च वने मुनींश्च |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
ऋषींश्च व्रह्मचर्येण सन्तत्या च पितामहान् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
ऋषींश्चापि महाभागान्परित्राय़स्व पावक ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
ऋषींश्चैव हि गोविन्दस्तपश्चैवानु कल्पय़त् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषींस्तानभिवाद्याथ पार्श्वे हिमवतोऽच्युतः |
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषीञ्शान्तनवो दृष्ट्वा सभाद्वारमुपस्थितान् |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
वृषादर्भिरु उवाच
ऋषीणां गच्छ सप्तानामरुन्धत्यास्तथैव च |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
ऋषीणां च नदीनां च कुलानां च महात्मनाम् |
६२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
ऋषीणां च पुराणानां देवासुरविमिश्रिताः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
ऋषीणां चैव संवादं त्रिदशानां च भारत ||
२ ख