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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा गुप्तः प्राय़ाद्भीमरथं प्रति ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा गुप्तस्तव पुत्रैश्च सर्वशः ||
४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा तस्थौ नानाध्वजसमुत्थय़ा ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा युक्तः सुय़ोधनमुपागमत् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा युक्ता नानादेशसमुत्थय़ा |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा युक्ता वामं पक्षमपालय़न् ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा युक्तो भीष्महेतोः पराक्रमी ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
महत्या सेनय़ा राजन्विनीतैः परिचारकैः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा राजन्सोदर्यान्समभाषत ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ७८
वृहदश्व उवाच
महत्या सेनय़ा राजा दमय़न्तीमुपानय़त् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३६
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं जग्मुर्द्रोणरथं प्रति ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं ततो युद्धमभूत्पुनः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं ततो युद्धमवर्तत ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं तव पुत्रैस्तथा विभो ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं द्रोणानीकमुपाद्रवत् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं परिवव्रुः स्म पार्षतम् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं प्रय़यौ दक्षिणां दिशम् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं मद्रदेशसमुत्थय़ा ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
महत्या सेनय़ा सार्धं सेनापृष्ठे व्यवस्थिताः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
महत्सु चोपविष्टेषु गन्धर्वेषु च भारत ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
महत्सु भूतेषु वसन्ति पञ्च; पञ्चेन्द्रिय़ार्थाश्च तथेन्द्रिय़ेषु |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
महत्सु राजवंशेषु गुणैः समुदितेषु च |
१६४ क
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
महदाख्यानमास्तीकं यत्रैतत्प्रोच्यते द्विज |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
महदादिविशेषान्तमसक्तप्रभवाव्ययम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
महदाश्चर्यमिति वै विव्रुवाणा महीपते ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
महदासीत्तय़ोर्युद्धं चित्ररूपं भय़ानकम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
महदुक्थ्यं गीय़ते साम चाग्र्यं; सम्यक्सोमः पीय़ते चात्र सत्रे |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
महदुग्रं तपः कृत्वा मां निषेवन्ति मानवाः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
महदैश्वर्यमिच्छन्तस्त्रिपुरं दुर्गमाश्रिताः ||
२० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
महद्दुःखं समासाद्य तिर्यग्योनौ प्रजाय़ते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
महद्दुःखं हि मानुष्यं निरय़े चापि मज्जनम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
महद्द्वन्द्वप्रमोक्षाय़ सा सिद्धिर्या वय़ोतिगा ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
महद्धि कार्यं वोढव्यमिति मे वर्तते मतिः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
महद्धि परमं भूतं युक्ताः पश्यन्ति योगिनः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
महद्धि भरतश्रेष्ठ व्राह्मणस्तीर्थमुच्यते |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
महद्ध्यभीक्ष्णं कौरव्य कर्ता सन्मानमर्हति ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
महद्ध्येतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान्प्रभो ||
१२८ ग
आदि पर्व
अध्याय १७१
वसिष्ठ उवाच
महद्धय़शिरो भूत्वा यत्तद्वेदविदो विदुः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
महद्भिः पृषतैस्तूर्णं वर्षमभ्याजगाम ह ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
महद्भिः समरे तस्मिन्नन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
महद्भिरिष्टं भोगाश्च भुक्ताः पुत्राश्च पालिताः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
महद्भिरिष्ट्वा क्रतुभिर्महाय़शा; स्त्रिविष्टपे स्थानमुपैति सत्कृतम् ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
महद्भिर्विहितैः सत्यैः सिद्धैः सर्वार्थसाधकैः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
महद्भिस्तैरभीतानां यमराष्ट्रविवर्धनम् ||
७२ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
महद्भिस्तोय़कलशैः कठिनैश्चोपशोभितम् |
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
महद्भैरवमासीन्नः संनिवृत्तेषु पाण्डुषु |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
महद्भ्यां रथवंशाभ्यां परिगृह्य वलं तव ||
३९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
महद्भय़ं च भूतानां सर्वेषां समजाय़त ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
महद्भय़ं वेदय़न्ति तस्मिन्नुत्पातलक्षणे ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१
सूत उवाच
महद्यशस्त्वमिति सदाभिपूज्यसे; मनीषिभिर्मुदितमना महर्षिभिः |
१६ क