chevron_left  एवंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
एवं सदा मन्त्रय़ितव्यमाहु; र्ये मन्त्रतत्त्वार्थविनिश्चय़ज्ञाः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
एवं सद्भिर्विनीतेन पथा गन्तव्यमच्युत |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सनत्सुजातेन विदुरेण च धीमता |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
धृतराष्ट्र उवाच
एवं सन्तर्ज्यमानस्तु मम पुत्रो महीपतिः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
एवं सन्तो वर्तमाना एधन्ते शाश्वतीः समाः ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
एवं सन्दर्शय़न्कृष्णो रणभूमिं किरीटिनः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
एवं सन्दर्शय़ित्वा तु नारदं परमेष्ठिजम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सन्दिश्य तनय़ं प्रतीपः शन्तनुं तदा |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सन्दिश्य तु प्रेष्यान्वलदेवो महावलः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
एवं सप्तदशं देहे वृतं षोडशभिर्गुणैः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
एवं समभवंस्तस्य वरास्ते दीप्ततेजसः ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं समागताः सर्वे गुरुभिर्वान्धवैस्तथा |
७ क
वन पर्व
अध्याय ७२
वृहदश्व उवाच
एवं समाहिता गत्वा दूती वाहुकमव्रवीत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
एवं समीक्ष्य निमय़न्नाधर्मोऽस्ति कदाचन ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
एवं समुदिता नारी का न्वन्या दुःखिता भवेत् ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्पादय़न्तस्ते तथान्योन्यं महारथाः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
एवं सम्पूजितं रक्षो विप्रं तं प्रत्यपूजय़त् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १७१
अर्जुन उवाच
एवं सम्पूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्पूजितास्ते वै जग्मुर्विप्राश्च सर्वशः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्पूजितो जिष्णुरुवास भवने पितुः |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्पूजितो राजा पाण्डवैरम्विकासुतः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
एवं सम्पूज्य भगवानथर्वाङ्गिरसं तदा |
८ क
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्पूजय़ंस्तत्र कृष्णां प्रेक्ष्य सभासदः |
३० क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
एवं सम्प्रस्थिता राजन्नृषय़ः किल भारत ||
१२५ ख
आदि पर्व
अध्याय २००
जनमेजय़ उवाच
एवं सम्प्राप्य राज्यं तदिन्द्रप्रस्थे तपोधन |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
एवं सम्भाषणार्थाय़ सर्वशास्त्रवधाय़ च |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भृगुरु उवाच
एवं सम्भाषमाणं तु देवाः पार्थ पितामहम् |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
एवं सम्भाषमाणां तु नृशंसः शाल्वराट्तदा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
एवं सम्भाषमाणानां वहु तत्तज्जनाधिप |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्भाषमाणास्ते निन्दन्तश्च पुरोचनम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्भाषमाणास्ते सुवाहोर्विषय़ं महत् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं सम्भाषमाणाय़ाः सावित्र्या भोजनं प्रति |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्भाषमाणे तु धौम्ये कौरवनन्दन |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
एवं सम्भाषमाणौ तौ दृष्ट्वा शोकपराय़णौ |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सम्भाषमाणौ तौ प्राप्तौ वारणसाह्वय़म् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
भीष्म उवाच
एवं सम्वोध्यमानस्य वसिष्ठेन महात्मना |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सरस्वती राजन्स्तूय़माना महर्षिणा |
३२ क
स्त्री पर्व
अध्याय ४
विदुर उवाच
एवं सर्वं विदित्वा वै यस्तत्त्वमनुवर्तते |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सर्वं विनिश्चित्य व्यवसाय़ं स्वधर्मतः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
एवं सर्वमहं कालमिहासे मुनिसत्तम |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
एवं सर्वमहिंसाय़ां धर्मार्थमपिधीय़ते |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
एवं सर्वा दिशो दैत्यौ जित्वा क्रूरेण कर्मणा |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
एवं सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः पृष्टाः पुण्यतमाः शिवाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
एवं सर्वाणि कर्माणि स्वभावस्यैव लक्षणम् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सर्वाणि तीर्थानि पश्यमानस्तथाश्रमान् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
एवं सर्वाणि भूतानि व्रह्मैव प्रतिसञ्चरः ||
१४ ग
विराट पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं सर्वाणि सैन्यानि भग्नानि भरतर्षभ |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
एवं सर्वात्मनः साधोः सर्वत्र समदर्शिनः |
३० क
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
एवं सर्वानवद्याङ्गि स चानङ्गवशो भवेत् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
एवं सर्वानागताभ्यागतांश्च; राज्ञो दूतान्सर्वदिग्भ्योऽभ्युपेतान् |
४४ क