वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
एतदिच्छाम्यहं त्वत्तो ज्ञातुं सर्वमशेषतः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५२
राम उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कथ्यमानं तपोधनाः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
धृतराष्ट्र उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कुशलो ह्यसि भाषितुम् |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं चरितं तस्य धीमतः ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
४
धृतराष्ट्र उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वमाख्याहि पृच्छतः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन कथितं द्विज ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
तक्षो उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन कथय़स्व मे ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
जनक उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तद्व्रूहि वदतां वर ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे व्रूहि तपोधन ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
इन्द्र उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तव वाक्यमनिन्दिते ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः कुरुकुलोद्वह |
४ क
वन पर्व
अध्याय
३९
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्प्रसादाद्द्विजोत्तम |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं दत्तं येषु महाफलम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं निखिलेन परन्तप |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पितामह यथातथम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
शौनक उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पुराणे यदि पठ्यते ||
३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं प्रोच्यमानं त्वय़ा द्विज ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
मान्धातो उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं भगवंस्तद्व्रवीहि मे |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६४
वैशम्पाय़न उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं यथावत्तद्वदस्व मे ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विधिवद्द्विजसत्तम ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१०४
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण द्विजोत्तम |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
वैशम्पाय़न उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
१०२
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामुने ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं संशय़ोऽत्र हि मे महान् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वमेव यथाविधि ||
४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वविच्चासि मे मतः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुमथ यास्यामि तत्र वै ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
एतदिच्छाम्यहं सर्वं तत्त्वेन भरतर्षभ |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
ऋषय़ ऊचुः
एतदिन्द्रेण कर्तव्यमिन्द्रे हि विपुलं वलम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
एतदीदृशकं कृत्वा मद्रराजो महारथः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
एतदीदृशकं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ||
५१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
एतदीदृशकं वृत्तं राजन्सुप्तजने विभो |
१४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
भीष्म उवाच
एतदुक्तं परं व्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
एतदुक्तममुत्रार्थं दैवं पित्र्यं च भारत |
१०१ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
व्राह्मण उवाच
एतदुत्कृत्य मे देहि यदि सत्यव्रतो भवान् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
एतदुत्तममित्रस्य निमित्तमभिचक्षते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
एतदुन्मज्जनं तस्य यदय़ं व्राह्मणो भवेत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
एतदुन्मेषमात्रेण विनिष्टं स्थाणुजङ्गमम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
एतदेकपदं शक्र सर्वलोकसुखावहम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
एतदेकशतं राजन्कन्या चैका प्रकीर्तिता ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एतदेकादशं प्रोक्तं पर्वातिकरुणं महत् |
१९४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
एतदेतादृशं दिव्यमरण्यं व्राह्मणा विदुः |
२५ क