शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
मध्विवामृतसंय़ुक्तं तस्मादेतौ मताविह ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
मन इत्येव भगवांस्तदा प्राह सरस्वतीम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
मनः कृत्वा सुकल्याणं मा भैस्त्वं प्रतिसंस्तभ ||
६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
मनः पञ्चेन्द्रिय़ाणीव शुशुभे योधय़न्रणे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
मनः प्रणय़तेऽऽत्मानं स एनमभिय़ुञ्जति ||
२० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
अलर्क उवाच
मनः प्रति सुतीक्ष्णाग्रानहं मोक्ष्यामि साय़कान् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
मनः प्रविष्टो देवर्षे गुणकेश्याः पतिर्वरः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
मनः प्रसृजते भावं वुद्धिरध्यवसाय़िनी |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
मनः प्रह्लादय़ामासा तस्य तत्पुरमुत्तमम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
मनः प्राणे निगृह्णीय़ात्प्राणं व्रह्मणि धारय़ेत् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
मनः शीघ्रतरं वाय़ोश्चिन्ता वहुतरी नृणाम् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
मनः श्रोत्रादिभिर्युक्तं शव्दादीन्साधु पश्यति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
मनः षोडशकं प्राहुरध्यात्मगतिचिन्तकाः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
मनः संहृत्य विषय़े वुद्धिर्विस्तरगामिनी ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
मनः संय़म्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
मनः सत्त्वगुणं प्राहुः सत्त्वमव्यक्तजं तथा |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
मनः सुनिय़तं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षय़ा |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
मनःकर्णसुखा नित्यं शृण्वन्नुच्चावचा गिरः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
मनःप्रसादः परमो वभूव; यथा दिवं प्राप्य मरुद्गणानाम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
मनःप्रह्लादजननं दृष्टिकान्तमतीव च |
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
मनःप्रह्लादनश्चासीत्सर्वलोकस्य भारत ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
मनःप्रह्लादनीं वाचं सैनिकानामथाव्रवीत् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
मनःप्रह्लादिनीं चित्रां सर्वरत्नविभूषिताम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
मनःप्रह्लादिनीं दिव्यां तामिहैकमनाः शृणु ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
मनःप्रीतिकरं भद्रे यद्व्रवीषि सुमध्यमे |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
मनःशिलागिरेः शृङ्गं वज्रेणेवावदारितम् ||
१०५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
मनःशिलागुहाश्चैव सन्ध्याभ्रनिकरोपमाः |
८१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
मनःशिलोज्ज्वलापाङ्गा गौर्यस्त्रिककुदाञ्जनाः |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
मनःश्रुतिहरो नादो मनो मोहय़तीव मे ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
मनःषष्ठानि वक्ष्यामि पञ्च कर्मेन्द्रिय़ाणि तु ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
मनःषष्ठानि संय़म्य हवींष्येतानि सर्वशः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
मनःषष्ठानि सर्वाणि वुद्ध्यभावे कुतो गुणाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
मनःषष्ठानि सर्वाणि वुद्ध्यभावे कुतो गुणाः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
मनःषष्ठानीन्द्रिय़ाणि कृच्छ्रान्मुक्तोऽसि तेन वै ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
मनःषष्ठानीन्द्रिय़ाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
मनःषष्ठेषु शुद्धात्मन्रेतः सम्पद्यते महत् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२३
सूत उवाच
मनःसंहर्षणं पुण्यं गन्धर्वाप्सरसां प्रिय़म् |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
मनःसङ्कल्पसंसिद्धा विशुद्धज्ञाननिश्चय़ाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
मनःसमाधिरत्रापि तथेन्द्रिय़जय़ः स्मृतः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
मनःसमाधिसंय़ुक्तः सुगतिं प्रतिपद्यते ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
मनःसमाधिसंय़ुक्तो न स सेवेत दुष्कृतम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
शौनक उवाच
मनःसागरसम्भूतां महर्षेः पुण्यकर्मणः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
मनवः सप्तसोमश्च अथर्वा सवृहस्पतिः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
मनवे सूर्यपुत्राय़ ददुः खड्गं सुविस्तरम् ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
मनश्च प्रथितं राजन्पञ्चेन्द्रिय़समीरणम् |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
मनश्च मे शत्रुनिवारणे ध्रुवं; स्वरक्षणे चाचलवद्व्यवस्थितम् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
मनश्चकार युद्धाय़ राजानं चाभ्यभाषत ||
८ ख