अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
मनुनाभिहितं शास्त्रं यच्चापि कुरुनन्दन |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
मनुर्मनुजशार्दूल तस्मिञ्शृङ्गे न्यवेशय़त् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात्तं मत्स्यं पाणिना स्वय़म् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
मनुश्च लोकभूत्यर्थं सुताय़ेक्ष्वाकवे ददौ ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यं न हि मेने स कञ्चित्सदृशमात्मनः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ||
१२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
मनुष्यगजवाजीनां शरशक्त्यृष्टितोमरैः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यतामनुप्राप्तो नैनं शोचितुमर्हसि ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
मनुष्यत्वाच्च देवत्वं देवत्वात्पौरुषं पुनः |
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
मनुष्यत्वाच्च निरय़ं पर्याय़ेणोपगच्छति ||
३६ ग
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
मनुष्यत्वात्परिभ्रष्टस्तिर्यग्योनौ प्रसूय़ते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
मनुष्यत्वे च विप्रत्वं सर्व एवाभिनन्दति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
मनुष्यदुर्गमव्दुर्गं वनदुर्गं च तानि षट् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
मनुष्यदेहशून्यकं भवत्यमुत्र गच्छतः |
५३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण न हि युज्यते |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
मनुष्यपिशिते सक्तश्चरिष्यसि महीमिमाम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यभारान्दाशार्हो ददौ दश जनार्दनः ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
मनुष्यमातङ्गरथाश्वराशिभि; र्द्रुतं व्रजन्तो वहुधा विचूर्णिताः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यमेषवक्त्राश्च सृगालवदनास्तथा |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
मनुष्ययोनिमिच्छन्ति सर्वभूतानि सर्वशः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
मनुष्यलोकक्षपणोऽथ घोरो; नो चेदनुप्राप्त इहान्तकः स्यात् ||
३५ ग
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यलोके कृत्स्नेऽस्मिंस्तादृशीं कुरु वै सभाम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
मनुष्यलोके यच्छ्रेय़ः परं मन्ये युधिष्ठिर ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
मनुष्यलोके विख्यातां गिरिशृङ्गविदारिणीम् ||
४७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यलोके सकले यस्य तुल्यो न विद्यते |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यलोके सकले समोऽस्ति; यय़ोर्न रूपे न वले न शीले ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
युधिष्ठिर उवाच
मनुष्यलोके सर्वस्मिन्यदमुत्रेह चाप्युत ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
मनुष्यवदनास्त्वन्ये भारुण्डा इति विश्रुताः |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
मनुष्यवद्गतो भावः स्नेहवद्धोऽभवद्भृशम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
मनुष्यवाजिमातङ्गा विद्धाः पेतुर्गतासवः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
मनुष्यवाजिमातङ्गान्प्रहिण्वन्तं यमक्षय़म् ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
मनुष्यविजय़े युक्तो हन्ति शत्रूननुत्तमान् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
मनुष्यशालावृकमप्रशान्तं; जनापवादे सततं निविष्टम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
मनुष्यशीर्षपाषाणां शक्तिमीनां गदोडुपाम् ||
३४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
मनुष्यशीर्षोपलमांसकर्दमा; प्रविद्धनानाविधशस्त्रमालिनी ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
मनुष्यसमतां ज्ञात्वा सप्त सन्धाय़ साय़कान् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
मनुष्या जगति श्रेष्ठाः पक्षिणां गरुडो वरः |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
मनुष्या भिन्नमर्यादाः सर्वे ते तामसा जनाः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
मनुष्या मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते अल्पवुद्धय़ः ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
मनुष्या मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते येऽल्पवुद्धय़ः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
मनुष्या मानुषैरेव दासत्वमुपपादिताः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
मनुष्या यदि वा देवाः शरीरमुपताप्य वै |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
मनुष्या रक्षिता राज्ञा समन्तादकुतोभय़ाः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्या वुद्धिसम्पन्ना दय़ां कुर्वन्ति जन्तुषु |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
मनुष्या ह्याढ्यतां प्राप्य राज्यमिच्छन्त्यनन्तरम् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
मनुष्याः पितरो देवाः पशवो मृगपक्षिणः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
मनुष्याणां तु मध्याह्ने प्रदद्यादुपपत्तितः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
मनुष्याणां तु राजन्यः क्षत्रिय़ो मध्यमो गुणः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
मनुष्याणां महादेवादन्यत्रापि तपोवलात् ||
१६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
मनुष्याणां महाराज यदा पापो न वार्यते ||
१० ख