वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
एकैकेन विपाठेन जघ्ने माद्रवतीसुतः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
एकैकेन हि वाणेन भूमौ पातितवानहम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
एकैकेनेषुणा सङ्ख्ये निर्विभेद महारथः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
यातुधान्यु उवाच
एकैको नाम मे प्रोक्त्वा ततो गृह्णीत माचिरम् ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एकैको यत्र लभते सहस्रपरमां भृतिम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
एकैको हि तदा योधो धार्तराष्ट्रस्य भारत |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
एकैको हि पृथक्तेषां समस्तां सुरवाहिनीम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
एकैव च सुता शुभ्रा सुकन्या नाम भारत ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
एकैव त्वमिहागच्छ तिष्ठन्त्वत्रैव दारकाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
एकैव मम कन्यैषा युवां परिचरिष्यति |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
एकैव हि भवेद्भार्या वैश्यस्य कुरुनन्दन |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
युधिष्ठिर उवाच
एकैवैषा गतिस्तेषामुत यान्त्यपरामपि ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
एको गन्धर्वराजानं चित्रसेनमरिन्दमः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
एको गुरुर्नास्ति ततो द्वितीय़ो; यो हृच्छय़स्तमहमनुव्रवीमि |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
एको जनपदो राजन्द्वीपेष्वेतेषु भारत |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
एको दीर्घ इव प्रांशुः प्रभवन्दृश्यते शरः ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
एको दीर्घ इवादृश्यदाकाशे संहतः शरः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
एको दीर्णो दारय़ति सेनां सुमहतीमपि |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
एको दुर्योधनो राजन्नदृश्यत भृशं क्षतः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
एको दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौवलः |
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
एको दुर्योधनो ह्यासीत्पुमानिति मतिर्मम ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
एको दोषोऽवशिष्टस्तु वध्यः स न हतो मय़ा ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
एको दोषोऽस्य नान्योऽस्ति सोऽद्य प्रभृति सत्यवान् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
अर्जुन उवाच
एको द्रोणो हि वेदैतदहं तस्माच्च सत्तमात् ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
एको द्वाभ्यां हतः शेषे त्वमधर्मेण धार्मिकः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
एको द्विवर्ण एवाथ तथात्रैवोपलक्षितः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
एको द्वेष्टा नास्ति ततो द्वितीय़ो; यो हृच्छय़स्तमहमनुव्रवीमि |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
एको धर्मः परं श्रेय़ः क्षमैका शान्तिरुत्तमा |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
एको ध्यानपरस्तूष्णीं किमास्से चिन्तय़न्निव ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृय़ात् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
एको नरसहस्रेषु धर्मविद्विद्यते न वा |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
एको निवातकवचानवधीद्दिव्यकार्मुकः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
एको निशि महावाहो कीचकं तं निषूदय़ ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् |
९१ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
कीचक उवाच
एको भद्रे गमिष्यामि शून्यमावसथं तव ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
एको भर्ता स्त्रिय़ा देवैर्विहितः कुरुनन्दन |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
एको भीमः परं शक्त्या युध्यत्येष महाभुजः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
एको भीमो धार्तराष्ट्रेषु मग्नः; स मामुपालव्धुमरिन्दमोऽर्हति ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
एको य आश्रमानेताननुतिष्ठेद्यथाविधि |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं तं वै समादिश ||
९३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
एको रणे धारय़ेय़ं समस्तानिति भारत ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
एको रथसहस्राणि निहन्तुं वासवी रणे ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एको रथो गजश्चैको नराः पञ्च पदातय़ः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
युधिष्ठिर उवाच
एको लोकः सुकृतिनां सर्वे त्वाहो पितामह |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
एको लोभो महाग्राहो लोभात्पापं प्रवर्तते ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
एको वंशधरः शूर एकस्यां सम्भविष्यति |
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
एको वन्धुर्नास्ति ततो द्वितीय़ो; यो हृच्छय़स्तमहमनुव्रवीमि |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
एको वहुभिरत्यर्थं धैर्याद्राजन्न विव्यथे ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
एको वहूनभ्यपतद्गरुत्मन्पन्नगानिव ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
धृतराष्ट्र उवाच
एको वहूनां शैनेय़स्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
४ ख