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अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
मनसोद्दिश्य विपुलं ततो वाक्यमथोचतुः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
मनसोपचितिं कृत्वा निरस्य च वहिष्क्रिय़ाः ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
मनसोऽप्रतिकूलानि प्रेत्य चेह च वाञ्छसि |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
मनस्तथैवाहङ्कारे प्रतिष्ठाप्य नराधिप |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
मनस्तापान्वितो राजा श्रावितः शोकलालसः ||
१४३ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
मनस्तासु विनिक्षिप्य कामय़ानो वराङ्गनाः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
मनस्तु पूर्वमादद्यात्कुमीनानिव मत्स्यहा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
मनस्तु यत्कर्म करोति किं चि; न्मनःस्थ एवाय़मुपाश्नुते तत् ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
मनस्तेऽभून्महावाहो हत्वा चापि जय़द्रथम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
मनस्त्वपहृतं वुद्धिमिन्द्रिय़ार्थनिदर्शनम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
मनस्यन्तर्हितं द्वारं देहमास्थाय़ मानसम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
मनस्यन्तर्हितं सर्वं वेद सोत्तमपूरुषः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
मनस्याकृतय़ो मग्ना मनस्त्वतिगतं मतिम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
मनस्युपरते राजन्निन्द्रिय़ोपरमो भवेत् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
मनस्युपरतेऽध्यात्मा चन्द्रमस्यवतिष्ठते ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
मनस्युरभवत्तस्माच्छूरः श्येनीसुतः प्रभुः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
मनस्येकाग्रतां कृत्वा तत्परं प्रतिपद्यते ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
मनस्योरभवन्पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
मनस्विनः सत्यपराक्रमाश्च; महावला यादवा भोगवन्तः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
द्रौपद्यु उवाच
मनस्विनमजानन्तो मा वै व्रूय़ुः कुमारकाः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
मनस्विनस्तीर्थय़ात्रापराय़णा; स्ते तत्र मोदन्ति गवां विमाने ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
मनस्विनी यत्र च वाञ्छसि त्व; मिष्टान्कामान्भारत स्वस्तिकामः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
मनस्विनो मन्युमन्तः पुण्यलोका भवन्ति ते |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
मनस्वी वलवाञ्शूरः कृतास्त्रश्च तपोधनः |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
मनस्वी वलवाञ्शूरः कृतास्त्रो दृढविक्रमः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
मनस्वी वलवान्दृप्तो मानी शूरश्च पाण्डवः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
मनांसि तस्य योधानां ध्रुवमावर्तय़िष्यति ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
मनांसि पाण्डुपुत्राणां मज्जय़त्यप्लवानिव ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
मनांस्यादाय़ सर्वेषां कृष्णा वचनमव्रवीत् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
मनांस्याराधय़ामास प्रजानां स महीपतिः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
मनागसि मय़ा न शप्तः |
१६४ घ
आदि पर्व
अध्याय २२३
स्तम्वमित्र उवाच
मनीषिणस्त्वां यजन्ते वहुधा चैकधैव च ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
मनीषिणां तत्त्वविच्छेदनाय़; विधीय़ते सत्सु वृत्तिः सदैव |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
मनीषिणो हि ये केचिद्यतय़ो मोक्षकाङ्क्षिणः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
मनीषितं च प्राप्नोति चिन्तय़न्पुरुषोत्तमम् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
मनीषितं विजानाति केशवो न तु तस्य ते ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
मनीषिताः सर्वलोकोद्भवानां; तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
मनीषी मनसा विप्रः पश्यत्यात्मानमात्मनि ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
मनीषी मनसा विप्रः पश्यत्यात्मानमात्मनि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
मनीषय़ा ततः क्षिप्रमागतोऽस्मि नरर्षभ ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
मनीषय़ा वहुविधरत्नभूषितं; ससर्ज यन्नास्ति शतक्रतोरपि ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
मनीषय़ाथो मनसा हृदा च; य एवं विदुरमृतास्ते भवन्ति |
६ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
मनुः क्षुपो रघुर्भानुः कृशाश्वः सगरः शलः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
मनुः प्रजानां रक्षार्थं क्षुपाय़ प्रददावसिम् ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
मनुजव्याघ्र भवति तत्र मे नास्ति संशय़ः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
मनुजा धृष्टमपरे वीक्षां चक्रुः सविस्मय़ाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
मनुजाश्च शतस्त्रीकाः शतशो विधवाः स्त्रिय़ः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
मनुना च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानवाः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
मनुना चापि राजेन्द्र गीतौ श्लोकौ महात्मना |
२३ क