chevron_left  मधुकैटभय़ोःarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
मधुकैटभय़ोः पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुणः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
मधुकैटभय़ोः पुत्रो धुन्धुर्भीमपराक्रमः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
मधुच्छन्दश्च भगवान्देवरातश्च वीर्यवान् |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय ८७
यय़ातिरु उवाच
मधुच्युतो घृतपृक्ता विशोका; स्ते नान्तवन्तः प्रतिपालय़न्ति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
मधुदोहं दुहेद्राष्ट्रं भ्रमरान्न विपातय़ेत् |
४ क
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
मधुपिङ्गो मधुरवाक्तपःस्वाध्याय़भूषणः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २९०
वैशम्पाय़न उवाच
मधुपिङ्गो महावाहुः कम्वुग्रीवो हसन्निव |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
मधुप्रपातो हि भवान्भोजनं विषसंय़ुतम् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
मधुप्रवाहा घृतरागोद्धृताभि; र्महोर्मिभिः शोभिता व्राह्मणैश्च |
८९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
मधुप्रेप्सुरिवावुद्धिः प्रपातं नाववुध्यते ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
मधुमांसनिवृत्तानां मदाद्दम्भात्तथानृतात् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
मधुमांसनिवृत्त्येति प्राहैवं स वृहस्पतिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
भीष्म उवाच
मधुमांसैर्मूलफलैरन्नैरुच्चावचैरपि |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १४
शौनक उवाच
मधुरं कथ्यते सौम्य श्लक्ष्णाक्षरपदं त्वय़ा |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
मधुरः सुप्रसादश्च किरीटी च महावलः ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
मधुरस्वरैर्मधुकरैर्विरुतान्कमलाकरान् |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
मधुरानूषरे देशे प्रभूतय़वसेन्धने |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
मधुरानूषरे देशे शिवे पुण्ये महीपतिः |
६९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
मधुरास्तु कथाश्चित्राश्चित्रार्थपदनिश्चय़ाः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
मधुरेण स गीतेन वीणाशव्देन चानघ |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
मधुरेणैव राज्यस्य तेषामर्धं प्रदीय़ताम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
मधुरैः प्रश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिरनिष्ठुरैः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
मधुरो लवणस्तिक्तः कषाय़ोऽम्लः कटुस्तथा |
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
मधुरोऽम्लः कटुस्तिक्तः कषाय़ो लवणस्तथा |
४४ क
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
मधुलोभान्मधुकरैः षष्ठमाहुर्महद्भय़म् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
मधुसर्पिःप्रवाहिन्यः पय़ोदधिवहास्तथा |
६१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
भीम उवाच
मधुसूदन मा कार्षीर्विषादं यदुनन्दन |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
मधुसूदनमित्याहुरृषय़श्च जनार्दनम् |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
मधुसूदनमित्याहुर्वृषभं सर्वसात्वताम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम |
१३० क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
मधुस्रवफलां दिव्यां महर्षिगणसेविताम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
मधुस्रवैः सदा दिव्यां महर्षिगणसेविताम् |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
मधूकाम्रवनोपेतं प्लक्षन्यग्रोधसङ्कुलम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
मधूच्छिष्टस्थिताय़ां सा सुखाय़ां रुदती तथा |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
मध्यं गतमिवादित्यं प्रतपन्तं स्वतेजसा ||
७४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
मध्यं गते दिनकरे चक्रवत्प्रचरन्प्रभुः ||
१०० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
मध्यं चास्य जगतस्तस्थुषश्च; सर्वेषां भूतानां प्रभवश्चाप्ययश्च ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
मध्यं दिनमनुप्राप्तो गभस्तिशतसंवृतः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
मध्यं प्राप्तं यथा ग्रीष्मे तपन्तं भास्करं दिवि ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
मध्यं वृकोदरोऽभ्यागात्त्वदीय़ं नागधूर्गतः ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
मध्यकाय़ान्नरानन्यांश्चिच्छेदान्यांश्च कर्णतः |
१११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
मध्यङ्गत इवादित्यो दुष्प्रेक्ष्यस्ते पिताभवत् ||
१०६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
मध्यङ्गत इवादित्यो यो न शक्यो निरीक्षितुम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
मध्यङ्गतमिवादित्यं दृष्ट्वा शुकमवस्थितम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
मध्यतो मध्यपुण्यानामधो दुष्कृतकर्मणाम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
मध्यदेशपरिज्ञातो दस्युभावं गतः कथम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
गौतम उवाच
मध्यदेशप्रसूतोऽहं वासो मे शवरालय़े |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
मध्यदेशे महान्ग्रामो व्राह्मणानां वभूव ह |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
मध्यन्दिनगतं सङ्ख्ये न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् ||
११ ख