शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
भर्तुरर्थे तु यः शूरो विक्रमेद्वाहिनीमुखे |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
भर्तुरर्थेष्वसूय़न्तं न तं युञ्जीत कर्मणि ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भर्तुर्निःश्रेय़से युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भर्तुर्निःश्रेय़से युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
नागभार्यो उवाच
भर्तुर्भवतु किं चान्यत्क्रिय़तां तद्वदस्व मे ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
भर्तुर्वाक्यादथाव्यग्रा मात्रे हृष्टा न्यवेदय़त् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
भर्तुर्हि जीवितार्थं तु मय़ा चीर्णं स्थिरं व्रतम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
भर्तुश्चापि हितं यत्तत्सततं सानुवर्तते ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
भर्तृघ्नत्वान्न हि पापीय़ आहु; स्तस्मात्क्षत्तः किं न विभेषि पापात् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
भर्तृपिण्डकृतं राजन्निहतः पृतनामुखे ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
भर्तृपिण्डमुपाश्नन्यो राजद्विष्टानि सेवते |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
भर्तृपिण्डविमोक्षार्थं भर्तृकार्यविनिश्चिताः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
भर्तृप्रत्यय उत्पन्नो व्यवहारस्तथापरः |
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तृभिः सह भोक्तव्या निर्द्वन्द्वेति श्रुतं मय़ा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तृभिर्देवसङ्काशैर्जितां प्राप्स्यसि मेदिनीम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
भर्तृवर्जं वरारोहा सा भवेद्धर्मचारिणी ||
३९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
भर्तृव्यसनशोकार्ता न शेते वसतीः प्रभो ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाभवत् ||
९५ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलसमाश्रिता ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
भर्तृशोकसमाविष्टा निःश्वस्येदमुवाच ताः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
भर्तृस्मरणतन्वङ्गी तापसीवेषधारिणी |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
भर्तॄणां वचने चैव न स्थास्यन्ति तदा स्त्रिय़ः ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
भर्त्रा चैव समाय़ोगे सीमन्तोन्नय़ने तथा ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
भर्त्रा य एष दत्तस्ते चरुर्मन्त्रपुरस्कृतः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
भर्त्रा सा समनुज्ञाता क्रिय़तामित्यथाव्रवीत् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
भर्त्रानेन महाभागे संय़ोजय़ सुतेन ते ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
भर्त्रे प्रापय़ताद्यैव सर्वलक्षणपूजिताम् ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
भर्त्सय़त्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
भर्त्सय़न्सारथिं चोग्रं याहि याहीति सत्वरः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
भर्त्सय़ामास तेजस्वी तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
भर्त्सय़ित्वा तु राज्ञस्तांस्तृणीकृत्य सुय़ोधनम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
भर्त्सय़ित्वा तु रूक्षेण स्वरेण गतचेतनाम् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
भल्लभ्यां साधुमुक्ताभ्यां छित्त्वा कर्णस्य कार्मुकम् |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
भल्लातकानामलकान्हरीतकविभीतकान् ||
४२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
भल्लातकैर्मधूकैश्च चम्पकैः पनसैस्तथा ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
भल्लान्सुनिशितान्पीतान्स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
भल्लाभ्यां कार्मुकं चैव क्षिप्रं चिच्छेद पाण्डवः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
भल्लाभ्यां च सुतीक्ष्णाभ्यां धनुः केतुं च मारिष |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
भल्लाभ्यां पाण्डवो ज्येष्ठस्त्रिधा चिच्छेद मारिष ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
भल्लाभ्यां पाण्डवो ज्येष्ठस्त्रिधा चिच्छेद मारिष ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
भल्लाभ्यां भरतश्रेष्ठ सैन्धवस्य महात्मनः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
भल्लाभ्यां भृशतीक्ष्णाभ्यां तं च विव्याध पाण्डवः |
६३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
भल्लार्धचन्द्रक्षुरहिंसितानि; प्रपेतुरुर्व्यां नृशिरांस्यजस्रम् ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
भल्लेन भृशतीक्ष्णेन निचकर्तास्य कार्मुकम् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
भल्लेन भृशतीक्ष्णेन शिरश्चिच्छेद चारिहा ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
भल्लेन युधि विव्याध भीमो दुर्विषहं रणे |
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
भल्लेन शितधारेण चिच्छेदास्य महद्धनुः ||
१२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
भल्लेन शितधारेण स हतः प्रापतद्रथात् ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
भल्लेन सर्वावरणातिगेन; शिरः शरीरात्प्रममाथ भूय़ः ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
भल्लेनान्येन तु पुनः सुवर्णोज्ज्वलकुण्डलम् |
२२ क