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वन पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
भवेन सह सङ्ग्रामं चकाराप्रतिमं किल |
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
भवेनावस्थितो यानं दिव्यं तं देशमभ्ययात् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
भवेन्मम सुतोऽमर्त्य इति तं लव्धवांश्च सः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
भवेम धूतपाप्मानस्तीर्थसन्दर्शनान्नृप ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
भवेम न च लिप्येम दोषेणेति परन्तप ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मातर ऊचुः
भवेम पूज्या लोकस्य न ताः पूज्याः सुरर्षभ |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २१७
मातर ऊचुः
भवेम सर्वलोकस्य वय़ं मातर उत्तमाः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
भवेम सहिताः सर्वे निवर्तध्वं यथावलम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
भवेस्त्वं यद्यपि त्वाढ्यो न राजा न च दैवतम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
भवेय़ं पुरुषो यक्ष त्वत्प्रसादादनिन्दितः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
भवेय़मिति सञ्चिन्त्य व्राह्मणं तं नमस्य च ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
भवेय़ुरग्नय़स्तस्य परिचीर्णास्तु नित्यशः |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ६४
ऋतुपर्ण उवाच
भवेय़ुरश्वाध्यक्षोऽसि वेतनं ते शतं शताः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३०
सूत उवाच
भवेय़ुर्भुजगाः शक्र मम भक्ष्या महावलाः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
भवेय़ुर्वेदविदुषः सर्वे वाक्पतय़स्तथा ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
भवो रोषसमाविष्टः शूलोद्यतकरः स्थितः ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
भव्या पृथिव्या भाविनी भाति राज; न्गङ्गा लोकानां पुण्यदा वै त्रय़ाणाम् ||
८८ ख
सभा पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
भषन्ते तात सङ्क्रुद्धाः श्वानः सिंहस्य संनिधौ ||
८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २२
गान्धार्यु उवाच
भषन्तो व्यपकर्षन्ति गहनं निम्नमन्तिकात् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
भषेय़ुः सहिताः सर्वे तथेमे वसुधाधिपाः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
भस्त्रा माता पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
भस्म कुर्याज्जगदिदं मनसैव जनार्दनः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
भस्म कुर्युर्जगदिदं क्रुद्धाः प्रत्यक्षदर्शिनः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
भस्म सर्वं समाहृत्य काश्यपो वाक्यमव्रवीत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
भस्मकूट इवावुद्धिः खरो रजसि मज्जति ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
भस्मच्छन्नानिवाग्नींस्तान्वुध्येथास्त्वं प्रय़त्नतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
भस्मदिग्धोर्ध्वलिङ्गाय़ तस्मै रुद्रात्मने नमः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
भस्मप्रस्तरशाय़ी च भूमिशय़्यानुलेपनः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
भस्मराशीकृतं वृक्षं विद्यया समजीवय़त् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
भस्मवर्णप्रकाशेन तमसा संवृतं नभः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
भस्मशाय़ी भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरुर्गणः ||
९२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
भस्मापि न स विन्देत शिष्टं क्वचन भारत ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
भस्मावृताङ्गानिव हव्यवाहा; न्पार्थान्प्रदध्यौ स यदुप्रवीरः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
भस्मीकृतां तां पतितां विशीर्णां; चक्राहतां द्रक्ष्यसि केशवेन ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६
पुलोमो उवाच
भस्मीभूतं च तद्रक्षो मामुत्सृज्य पपात वै ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
भस्मीभूतोऽपतद्भूमौ रथो गाण्डीवधन्वनः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
भाः कुर्वता भानुमता ग्रहेण; दिवाकरेणाग्निरिवाभितप्तः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
भागः पुनः पाण्डवानां निविष्ट; स्तं नोऽकस्मादाददीरन्परे वै |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
भागधेय़समाय़ुक्तो ध्रुवमुत्पद्यते नरः |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय ४४
शकुनिरु उवाच
भागधेय़ानि हि स्वानि पाण्डवा भुञ्जते सदा ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
भागधेय़ान्वितस्त्वर्थान्कृशो वालश्च विन्दति ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
भागमन्यस्य निर्दिष्टं वध्यं भूमिभृदच्युतः ||
३३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
भागशो विचरन्मार्गानसिय़ुद्धविशारदः ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
भागशो विनिविष्टानि न कृषिर्देवमातृका ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
भागार्थं तपसोपात्तं तेषां सोमं तथाध्वरे |
३८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
भागार्हा देवताश्चैव यज्ञिय़ं द्रव्यमेव च ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
भागिनः स्वर्गलोकस्य वक्ष्यामि भरतर्षभ ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
भागिनेय़कृते वीरः स करिष्यति सङ्गरे |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
द्रौणिरु उवाच
भागिनेय़ान्निजांस्त्यक्त्वा कृतज्ञोऽस्मानुपागतः |
१९ क