chevron_left  मदान्धमाजौarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
मदान्धमाजौ समुदीर्णदर्पः; सिंहो जिघांसन्निव वारणेन्द्रम् ||
८७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
मदान्धा रोषसंरव्धा विषाणाग्रैर्महाहवे |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
मदान्धो वन्यनागेन्द्रः सपद्मां पद्मिनीमिव ||
२८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
व्राह्मण उवाच
मदाश्रय़ाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
देवा ऊचुः
मदास्यव्यतिषिक्तानामस्माकं लोकपूजित |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
मदिराश्व इति ख्यातः पृथिव्यां पृथिवीपतिः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
मदिराश्वश्च राजर्षिर्दत्त्वा कन्यां सुमध्यमाम् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
मदिराश्वस्य पुत्रस्तु द्युतिमान्नाम पार्थिवः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
मदीय़ा माननीय़ास्ते श्रोतव्यं च हितं वचः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
मदीय़ानां च कुपितो मा त्वं दण्डं निपातय़ेः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
मदीय़ानि च सर्वाणि ग्रहीष्यसि धनञ्जय़ ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
मदीय़ैरावृतो योधैः कर्ण तर्जय़तीव माम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
मदेनाभिप्लुतमनास्तच्च नग्राह्यमुच्यते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
मदो नाम महावीर्यो वृहत्काय़ो महासुरः |
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
मदोत्कटं वने दृप्तमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
इन्द्र उवाच
मद्गतानि च यानीह सर्वास्त्राणि कुरूद्वह ||
३० ग
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
मद्गुग्रीवश्च कृष्णौजा हंसवक्त्रश्च चन्द्रभाः ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
मद्गुभिः खञ्जरीटैश्च विचित्रैर्जीवजीवकैः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
मद्द्वितीय़ं पुनः पार्थं कः प्रार्थय़ितुमर्हति |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
मद्द्वितीय़ं पुनः पार्थं कः प्रार्थय़ितुमिच्छति |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
मद्द्वितीय़ेन तेनेह वैरं वः सव्यसाचिना ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
राजो उवाच
मद्धितार्थं कुलार्थं च तथात्मार्थं च नन्दिनि ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
मद्भक्त इति देवेश तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि ||
१६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
मद्भक्त एतद्विज्ञाय़ मद्भावाय़ोपपद्यते ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनर्हान्धिक्पापान्धृतराष्ट्रजान् ||
१३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
मद्भक्त्या सत्यवाक्येन क्षमय़ा च दमेन च ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३३
व्राह्मण उवाच
मद्भावभावनिरता ममैवात्मानमेष्यसि ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
मद्यपो भिन्नमर्यादः कृतघ्नो भ्रातृनिन्दकः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
मद्यमांसोपजीव्यं च विक्रय़ो लोहचर्मणोः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मद्रकाः सिन्धुसौवीरा धर्मं विद्युः कथं त्विह |
९१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
मद्रकाः सिन्धुसौवीरास्तथा पञ्चनदाश्च ये ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मद्रके सङ्गतं नास्ति क्षुद्रवाक्ये नराधमे ||
७३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मद्रके सङ्गतं नास्ति मद्रको हि सचापलः |
८० क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मद्रके सङ्गतं नास्ति हतं वृश्चिकतो विषम् |
८३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मद्रकेषु च दुःस्पर्शं शौचं गान्धारकेषु च ||
८० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मद्रकेषु विलुप्तेषु प्रख्याताशुभकर्मसु |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
मद्रकैः सहितो वीरैः कर्णपुत्रैश्च दुर्जय़ैः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं च कौन्तेय़ः शरवर्षैरवाकिरत् ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं च समरे दृष्ट्वा शूरं निपातितम् |
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं च समरे धर्मराजो महारथः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं च समरे समाश्रित्य महारथम् |
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं तु समरे दृष्ट्वा युद्धाय़ विष्ठितम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं त्रिभिर्वाणैर्वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं परीप्सन्तो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतम् ||
४६ ग
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं पुरस्कृत्य तूर्णमभ्यद्रवन्परान् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं महेष्वासं परिवार्य समन्ततः |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं महेष्वासं सहसैन्यं युधिष्ठिरः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं रणे क्रुद्धं यो हन्यात्कुरुनन्दन |
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
मद्रराजं विनिर्भिद्य निपपात महीतले ||
५० ख