शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
एतत्फलं जापकानां गतिश्चैव प्रकीर्तिता |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
एतत्फलमसूय़ाय़ा अभिमानस्य चाभिभो |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
एतत्फलमहिंसाय़ा भूय़श्च कुरुपुङ्गव |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
एतत्स नरशार्दूलो नामृष्यत तवात्मजः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्संय़मनं पुण्यमतीवाद्भुतदर्शनम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सञ्चिन्त्य भगवन्विधत्स्व यदनन्तरम् ||
६२ ग
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
एतत्सञ्चिन्त्य राजेन्द्र यत्क्षमं तत्समाचर |
७० क
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
एतत्सत्यं मय़ाख्यातं कारणं विस्तरेण वः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
एतत्सप्तात्मकं राज्यं परिपाल्यं प्रय़त्नतः ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्समर्थं पार्थानां तव चैव यशस्करम् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्समीक्ष्यात्मनि चावमानं; निय़म्य मन्युं वलवान्स मानी |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
एतत्समृद्धमप्यृद्धं तपो भवति केवलम् |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
एतत्सम्प्राप्य हृष्टात्मा दस्योः सर्वं द्विजस्तदा |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सम्वोधय़ामस्त्वां धर्मं त्वमनुपालय़ ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
एतत्सर्वं गुणवति धर्मनेत्रे महीपतौ ||
९४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सर्वं तु विज्ञाय़ आत्मदोषकृतं फलम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
एतत्सर्वं प्रतिच्छन्नं मय़ि नार्हसि गूहितुम् ||
७० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
एतत्सर्वं प्रपश्यामि त्वय़ि वुद्धिमतां वर |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
युधिष्ठिर उवाच
एतत्सर्वं महाप्राज्ञ याथातथ्येन मे वद ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
युधिष्ठिर उवाच
एतत्सर्वं महावाहो भवान्व्याख्यातुमर्हति ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सर्वं यथा वृत्तं तत्त्वं गावल्गणे रणे |
४६ क
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सर्वं यथातत्त्वं देवर्षे वदतस्तव |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
एतत्सर्वं यथातत्त्वं व्याख्यातुं मे त्वमर्हसि ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
एतत्सर्वं यथान्याय़ं कुर्वीथा भूरिदक्षिण |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२
ऋषय़ ऊचुः
एतत्सर्वं यथान्याय़ं श्रोतुमिच्छामहे वय़म् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
युधिष्ठिर उवाच
एतत्सर्वं यथावृत्तं विस्तरेण तपोधन |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
युधिष्ठिर उवाच
एतत्सर्वं यथावृत्तं श्रोतुमिच्छामि लोमश |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१२१
युधिष्ठिर उवाच
एतत्सर्वं यथावृत्तमाख्यातु भगवान्मम ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सर्वं विचार्याहं मन्ये न विजितामिमाम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
एतत्सर्वं विनिश्चित्य स्ववुद्ध्या भृगुनन्दन |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एतत्सर्वं सभापर्व समाख्यातं महात्मना |
१०३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
शिष्य उवाच
एतत्सर्वं समाचक्ष्व यथा विद्यामहं प्रभो ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
एतत्सर्वं समाज्ञाय़ वलाग्र्यं मम भारत |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
एतत्सर्वं समालोक्य वुधानामेष निश्चय़ः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
एतत्सर्वं समीक्ष्य त्वं चरितं मे निवेदय़ |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
एतत्सर्वं समीक्ष्य त्वमात्मत्यागं च गर्हितम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
एतत्सर्वं सुभगे प्रव्रवीहि; यथा लोकान्विरजाः सञ्चरेय़म् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
एतत्सर्वमतिदेशेन सृष्टं; यत्कर्तव्यं पुरुषेणेह लोके |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सर्वमनुध्यात्वा आत्मनश्च व्यतिक्रमम् |
५० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सर्वमनुस्मृत्य दह्यमानो दिवानिशम् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
युधिष्ठिर उवाच
एतत्सर्वमशेषेण पितामह यथातथम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
एतत्सर्वमशेषेण यथोक्तं परिवर्जय़ेत् |
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सर्वमहं सम्यगाचरिष्ये जनार्दन |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
एतत्सलिलराजस्य छत्रं छत्रगृहे स्थितम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
एतत्सहस्रपर्यन्तमहो व्राह्ममुदाहृतम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सारं महाराज धर्मार्थावत्र संश्रितौ ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
एतत्सिन्धोर्महत्तीर्थं यत्रागस्त्यमरिन्दम |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
एतत्सुदुर्लभतरमिह लोके द्विजोत्तम |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
प्रह्राद उवाच
एतत्सुधन्वन्पृच्छामि दुर्विवक्ता स्म किं वसेत् ||
२३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
एतत्सुनाभं वृष्णीनामृषभेण त्वय़ा धृतम् |
३८ क