द्रोण पर्व
अध्याय
१००
धृतराष्ट्र उवाच
एको वहून्समासाद्य कच्चिन्नासीत्पराङ्मुखः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
एको वाय़ुर्वहुधा वाति लोके; महोदधिश्चाम्भसां योनिरेकः |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
एको विष्णुरिवाचिन्त्यः कृत्वा प्राक्कर्म दुष्करम् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः |
१४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
एको वीरः सहस्राक्षो दैत्यदानवमर्दिता |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
एको वीरो देवराजो निहन्ता; यमः पितॄणामीश्वरश्चैक एव ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत्पर्णफलान्वितः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
धृतराष्ट्र उवाच
एको वै वहुलाः सेनाः प्रमृद्नन्पुरुषर्षभः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
एको हि योगोऽस्य भवेद्वधाय़; छिद्रे ह्येनं स्वप्रमत्तः प्रमत्तम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
९७
लोपामुद्रो उवाच
एको हि वहुभिः श्रेय़ान्विद्वान्साधुरसाधुभिः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
धृतराष्ट्र उवाच
एको हि समरे कर्म कृतवान्सत्यविक्रमः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
एको हुताशो वहुधा समिध्यते; एकः सूर्यस्तपसां योनिरेका |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
एको ह्यग्निः सुमना व्राह्मणोऽत्र; पञ्चेन्द्रिय़ाणि समिधश्चात्र सन्ति |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
एको ह्यत्र महेष्वासः सूतपुत्रो व्यवस्थितः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
एको ह्यपि वहून्हन्ति घ्नन्त्येकं वहवोऽप्युत |
५१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
एको ह्येकेन सततं युध्यमानो यदि प्रभो |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
एको ह्येव श्रिय़ं नित्यं विभर्ति पुरुषर्षभ |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
एकोदरकृते व्याघ्रः करोति विघसं वहु |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
एकोनत्रिंशे दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् |
११५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
एकोनविंशे दिवसे यो भुङ्क्ते एकभोजनम् |
८१ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एकोनषष्टिरध्याय़ास्तत्र सङ्ख्याविशारदैः ||
१७६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
एकोनषष्टिर्वैपुल्याच्छीतरश्मेर्महात्मनः ||
४२ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एकोनसप्ततिः प्रोक्ता अध्याय़ाः कर्णपर्वणि |
१७२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एकोनसप्ततिश्चैव तथाध्याय़ाः प्रकीर्तिताः ||
१२८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
एकोऽथ वाप्यच्युत तत्समक्षं; तत्क्षामय़े त्वामहमप्रमेय़म् ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
एकोऽद्य निहनिष्यामि पाण्डवानां महाचमूम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
एकोऽपसृत्य चेदिभ्यः पाण्डवान्यः समाश्रितः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
एकोऽपि हि सुखाय़ैषां क्षमः स्यादिति मे मतिः ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दान्तो विचक्षणः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
घटोत्कच उवाच
एकोऽप्यहमलं वोढुं किमुताद्य सहाय़वान् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
एकोऽप्येषां महाराज समर्थः संनिवारणे |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
एकोऽभ्यरक्षद्भरतानेको भवमतोषय़त् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
एकोऽस्त्रवित्सखा तेऽय़ं सोऽप्यस्मान्समुपेक्षते |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
एकोऽहमस्मीति च मन्यसे त्वं; न हृच्छय़ं वेत्सि मुनिं पुराणम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
एकोऽहमिति यन्मोहान्मन्यसे मां सुय़ोधन |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
एकोऽय़ं निहतः शेते नैष धर्मो मतो हि नः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
एकय़ा द्वे विनिश्चित्य त्रींश्चतुर्भिर्वशे कुरु |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
एकय़ा यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
एकय़ोनित्वाच्च परस्परं महय़न्तो लोकान्धारय़त इति ||
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
एडकाश्वखरोष्ट्रीणां सूतिकानां गवामपि |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
एडी भेडी समेडी च वेतालजननी तथा |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
एडूकान्पूजय़िष्यन्ति वर्जय़िष्यन्ति देवताः |
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
एत एव त्रय़ो लोका एत एवाश्रमास्त्रय़ः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
एत एव त्रय़ो वेदा एत एव त्रय़ोऽग्नय़ः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
एत एव समाजग्मुर्युद्धाय़ भरतर्षभ ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
एत एवंविधा देवा मनोरेव प्रजापतेः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
एत एवंविधाः कालाः क्षमाय़ाः परिकीर्तिताः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
एत एवासय़स्तीक्ष्णाः कृन्तन्त्याय़ूंषि देहिनाम् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
एत तिष्ठन्ति सामात्याः प्रेक्षकास्ते नरेश्वर ||
१४ ख