chevron_left  एतद्विज्ञाय़arrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३८
व्रह्मो उवाच
एतद्विज्ञाय़ विधिवल्लभते यद्यदिच्छति ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्वित्तं तदभवद्यदुद्दध्रे युधिष्ठिरः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
नागभार्यो उवाच
एतद्विदितमार्यस्य विवासकरणं मम |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
एतद्विदित्वा कार्त्स्न्येन यो न मुह्यति मानवः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
एतद्विदित्वा तत्त्वेन शीलवान्भव पुत्रक |
६८ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्विदित्वा तु भवान्प्रस्थापय़तु पाण्डवान् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११
शकुनिरु उवाच
एतद्विदुस्तपो विप्रा द्वन्द्वातीता विमत्सराः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
ऐल उवाच
एतद्विद्वन्कश्यप मे प्रचक्ष्व; यतो रुद्रो जाय़ते देव एषः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५३
युधिष्ठिर उवाच
एतद्विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्विद्वन्नुपादत्स्व स्वभावं पश्य लौकिकम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
विशोक उवाच
एतद्विद्वन्मुञ्च सहस्रशोऽपि; गदासिवाहुद्रविणं च तेऽस्ति ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
भीष्म उवाच
एतद्विद्वन्यथातत्त्वं सर्वं व्याख्यातुमर्हसि ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १०७
जनमेजय़ उवाच
एतद्विद्वन्यथावृत्तं विस्तरेण तपोधन |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्विधाय़ वै सर्वं देवार्हमतिमानुषम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
एतद्विनशनं कुक्षौ मैनाकस्य नरर्षभ |
३ क
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
एतद्विनशनं नाम सरस्वत्या विशां पते ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
एतद्विप्रा विजानीत हन्त भूय़ो व्रवीमि वः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
एतद्विमोक्ष इत्युक्तमव्यक्तज्ञानसंहितम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
एतद्विशन्ति भूतानि सर्वाणीह महाय़शाः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
एतद्विशेषणं तात मनोवुद्ध्योर्मय़ेरितम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
एतद्विषीदतीति ||
८९ 5
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
एतद्विष्णुपदं नाम दृश्यते तीर्थमुत्तमम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
धृतराष्ट्र उवाच
एतद्विस्तरतो युद्धं प्रव्रूहि कुशलो ह्यसि |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
युधिष्ठिर उवाच
एतद्विस्तरतो राजञ्श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
एतद्विस्तरशः सर्वं वुद्धिमार्गं प्रशंस मे ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
एतद्वुद्ध्या विनिश्चित्य मनसा भरतर्षभ |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
एतद्वुद्ध्यानुपश्यन्तः सन्त्यजेय़ुः शुभाशुभम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४१
व्यास उवाच
एतद्वुद्ध्वा भवेद्वुद्धः किमन्यद्वुद्धलक्षणम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
एतद्वुद्ध्वा भवेद्वुद्धः किमन्यद्वुद्धलक्षणम् |
५७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
एतद्वुद्ध्वा वुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
एतद्वृत्तं वासवस्य यमस्य वरुणस्य च |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
एतद्वृहस्पतिः श्रुत्वा चुक्रोध च शशाप च ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्वै कीर्तनीय़स्य सूर्यस्यैव महात्मनः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४१
व्यास उवाच
एतद्वै जन्मसामर्थ्यं व्राह्मणस्य विशेषतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
एतद्वै ते दिवा वृत्तं रात्रौ वृत्तमतोऽन्यथा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
एतद्वै नाकपृष्ठस्य द्वारमाहुर्मनीषिणः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
एतद्वै मानुषेणाद्य न शक्यं द्रष्टुमप्युत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
महेश्वर उवाच
एतद्वै मामकं तेजः समाविशति वासव |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्वै लेशमात्रं वः समाख्यातं विमत्सराः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
एतद्वै लेशमात्रेण कथितं ते मय़ानघ |
१११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
शुक उवाच
एतद्वै श्रोतुमिच्छामि तद्भवान्प्रव्रवीतु मे |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
एतद्वै सर्वकृत्यानां परं कृत्यं परन्तप |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्वो लक्षणं देवा मत्प्रसादसमुद्भवम् |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११
शकुनिरु उवाच
एतद्वोऽस्तु तपो युक्तं ददानीत्यृषिचोदितम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
एतद्व्रतं मम सदा हृदि सम्परिवर्तते |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
एतद्व्रतं महावाहो त्वय़ा सह कृतं मय़ा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
एतद्व्रतं समाश्रित्य सुखमेधन्ति ते जनाः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
एतद्व्रतफलं देहे परस्मिन्स्याद्यथा हि मे ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
एतद्व्रतमहं कृत्वा मात्रा ते सह पुत्रक |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
एतद्व्रवीतु भगवानुपपन्नोऽस्म्यधीहि भोः ||
४१ ग