chevron_left  एतदेतादृशंarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २६
व्राह्मण उवाच
एतदेतादृशं सूक्ष्मं व्रह्मचर्यं विदुर्वुधाः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
एतदेव निमित्तं ते पाण्डवास्तु यथा त्वय़ि |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
एतदेव निरोङ्कारं क्षत्रिय़स्य विधीय़ते |
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम् ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
एतदेव पवित्रेभ्यः सर्वेभ्यः परमं स्मृतम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
एतदेव पुनश्चोक्त्वा विवेश धरणीतलम् ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
एतदेव यदा वाक्यमाम्रेडय़ति वासवः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
एतदेव व्यवस्यन्ति कर्म कर्मेति कर्मिणः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
एतदेव हि कार्पण्यं समग्रमसमीक्षितम् |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
एतदेव हि लोकेऽस्मिन्कालचक्रं प्रवर्तते ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
एतदेवं विकुर्वाणां वुध्यमानो न वुध्यते |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२
वृहस्पतिरु उवाच
एतदेवं विजानन्वै न दास्यामि शचीमिमाम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
एतदेवंविधं चित्रमिह तात युधिष्ठिर |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५१
नाग उवाच
एतदेवंविधं दृष्टमाश्चर्यं तत्र मे द्विज |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
एतदेवंविधं वीर सम्पश्याय़ोधनं विभो |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
एतदेवङ्गतस्याहं सुखं पश्यामि केवलम् ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
पितामह उवाच
एतदेवमवश्यं हि भविता नैतदन्यथा |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
एतदेवान्तवेलाय़ां परिसङ्ख्याय़ तत्त्ववित् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
एतदेवाभिपद्यस्व मा ते भूच्चलितं मनः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
एतदैन्द्रिय़कं तात यद्भवानिदमाह वै ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
एतदौत्पातिकं घोरमासीद्भरतसत्तम |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
एतद्गृहाण प्रथमं प्रशस्तं गृहमेधिनाम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
एतद्गृहाण वचनं मय़ा यत्समुदीरितम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
एतद्गोशकृतः पुत्र माहात्म्यं तेऽनुवर्णितम् |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
एतद्दत्त्वा महद्द्रव्यं पूर्वदेशाधिपो नृपः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
एतद्ददानि ते विप्र सर्वज्ञस्त्वं हि मे मतः ||
३० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
एतद्दानं न्याय़लव्धं द्विजेभ्यः; पात्रे दत्तं प्रापणीय़ं परीक्ष्य |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
एतद्दानं न्याय़लव्धं द्विजेभ्यः; पात्रे दत्त्वा प्रापय़ेथाः परीक्ष्य |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
एतद्दुःखं सारथे धर्मराजो; यन्मां हित्वा यातवाञ्शत्रुमध्ये |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
एतद्दुर्योधनो लव्ध्वा समग्रं नागमण्डलम् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
एतद्दृष्टं भविष्ये हि रुरोरुत्तमतेजसः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
ऋषभ उवाच
एतद्दृष्टं मय़ा राजंस्ततश्च वचनं श्रुतम् |
४९ क
वन पर्व
अध्याय १८७
मार्कण्डेय़ उवाच
एतद्दृष्टं मय़ा राजंस्तस्मिन्प्राप्ते युगक्षय़े |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
एतद्दृष्टं श्रुतं चापि यथावन्नृपसत्तम |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १२५
लोमश उवाच
एतद्दृष्ट्वा महीपाल सिकताक्षं च भारत |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
एतद्देवासुरैर्गुप्तं तदाहुर्ज्ञानलक्षणम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
एतद्देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते ||
१५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
एतद्देहं समाख्यातं त्रैलोक्ये सर्वदेहिषु |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
एतद्द्रौपदि सन्धाय़ न मे मन्युः प्रवर्धते ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
एतद्द्वन्द्वसमाय़ुक्तं कालचक्रमचेतनम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
एतद्द्वारं त्रिलोकस्य स्वर्गस्य च सुखस्य च |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
एतद्द्वारं द्विजश्रेष्ठ दिवसस्य तथाध्वनः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
एतद्द्वारं महाराज मानसस्य प्रकाशते |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्द्वितीय़ं द्वीपस्य दृश्यते शशसंस्थितम् ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
एतद्द्वितीय़ं धर्मस्य द्वारमाचक्षते द्विज |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
एतद्धनञ्जय़ो वाच्यो नित्योद्युक्तो वृकोदरः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्धनमपर्यन्तमश्वमेधे महामखे |
१०२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
एतद्धर्मफलं पुत्र नराणां धर्मनिश्चय़े |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
युधिष्ठिर उवाच
एतद्धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वं व्याख्यातुमर्हसि ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
एतद्धर्ममधर्मं वा जन्मनैवाभ्यजाय़थाः |
२५ क