कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
एतान्पश्य च पाञ्चालान्द्राव्यमाणान्महात्मना |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
एतान्प्रमथ्य सङ्ग्रामे प्रिय़ार्थं तव कौरव |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
एतान्भित्त्वा शरै राजन्किरातान्युद्धदुर्मदान् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
शिष्य उवाच
एतान्मे भगवन्प्रश्नान्याथातथ्येन सत्तम |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
एतान्मे संशय़स्थस्य राजधर्मान्सुदुर्लभान् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
एतान्मय़ोक्तांस्तव राजधर्मा; न्नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
एतान्यज्ञमुषः पञ्च देवानभ्यसृजत्तपः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
एतान्यतिक्रमेद्यो वै स हन्याच्छरणागतम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्यत्यद्भुतान्येव कर्माण्यथ महात्मनः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
एतान्यद्भुतकल्पानि दृष्ट्वाहं द्रुतमागता ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
एतान्यनिगृहीतानि व्यापादय़ितुमप्यलम् |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
एतान्यनीकानि महानुभावं; गूहन्ति मेघा इव घर्मरश्मिम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
एतान्यपि महासत्त्वे स्थितान्यमिततेजसि ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्यप्रतिमानि त्वं कृत्वा कर्माणि भारत |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
एतान्यमर्षस्थानानि मर्षितानि त्वय़ानघ |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्यस्य मृषोक्तानि वहूनि भरतर्षभ |
४१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्यादित्यवर्णानि तपनीय़निभानि च |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्यासन्महासत्त्वे शन्तनौ भरतर्षभ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
एतान्युत्क्रमणस्थानान्युक्तानि मिथिलेश्वर ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
एतान्युपचितान्याहुः सर्वत्र लभते पुमान् ||
८२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
एतान्येनांसि सर्वाणि व्युत्क्रान्तसमय़श्च यः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
एतान्येव जितान्याहुः प्रशमाच्च त्रय़ोदश |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
एतान्येव तु कर्माणि क्रिय़माणानि मानवान् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
एतान्येव तु भूतानि प्राक्रोशन्वृत्तिकाङ्क्षय़ा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
एतान्येव निमित्तानि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
एतान्येव पदान्याहुः पञ्च वृद्धाः प्रशान्तय़े |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
वृहस्पतिरु उवाच
एतान्येवं यथोक्तानि वुध्येथास्त्रिदशाधिप |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
एतान्येवम्प्रकाराणि विहितानि पुरानघ |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
एतान्येवाभिजानाति यतो जाता हि भामिनी ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
एतान्राजा पालय़न्नप्रमत्तो; निय़ोजय़न्सर्ववर्णान्स्वधर्मे |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
एतान्वर्णान्वहुविधान्रूपे विभ्रत्सनातनः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
एतान्विमुच्य संवादान्सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
एतान्वेगान्यो विषहत्युदीर्णां; स्तं मन्येऽहं व्राह्मणं वै मुनिं च ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
एतान्वेगान्विनय़ेद्वै तपस्वी; निन्दा चास्य हृदय़ं नोपहन्यात् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
एतान्वै प्रातरुत्थाय़ देवान्यस्तु प्रकीर्तय़ेत् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
एतान्वै सप्तहोतॄंस्त्वं स्वभावाद्विद्धि शोभने ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
एतान्सत्त्वगुणान्विद्यादिमान्राजसतामसान् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्सप्त महेष्वासान्वीरान्युद्धाभिनन्दिनः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्समागतान्सर्वान्पञ्च शिष्यान्दमान्वितान् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८६
दूत उवाच
एतान्समारुह्य परैत सर्वे; पाञ्चालराजस्य निवेशनं तत् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
एतान्सरथनागाश्वान्निहत्याजौ सपत्तिनः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
एतान्सर्वाँल्लोकवीरानजेय़ा; न्महात्मनः सानुवन्धान्ससैन्यान् |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
एतान्सर्वानुपासङ्गान्क्षिप्रं वध्नीहि मे रथे |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
एतान्सर्वान्गोप्रदाने गुणान्वै; दाता राजन्नाप्नुय़ाद्वै सदैव ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
उपमन्युरु उवाच
एतान्सहस्रशश्चान्यान्समनुध्यातवान्हरः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
एतान्सहाय़ाँल्लिप्सेथाः सर्वास्वापत्सु भारत |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
एतान्सृष्ट्वा ततः पञ्च पितॄणामसृजत्सुतान् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
एतान्हत्वा कीदृशं तत्सुखं स्या; द्यद्विन्देथास्तदनुव्रूहि पार्थ ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्हि सर्वान्संरव्धान्निय़न्तुमहमुत्सहे |
२५ क