chevron_left  एतैर्विवर्धतेarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानं चापकर्षति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानमपहन्ति च |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
एतैर्हि राजा निय़तं चोद्यमानः शमं प्रति |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
एतैर्हि सहितः सर्वैः पाण्डवैः स्वैश्च भारत |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
एतैश्च धार्यते जन्तुरेतैः क्षीणैश्च क्षीय़ते |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
एतैश्च मुख्यैरपरैश्च राज; न्योधप्रवीरैरमितप्रभावैः |
१०५ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
एतैश्च विप्रय़ोगोऽपि दुःखं परमकं मतम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
एतैश्च स ह धर्मोऽपि तं जीवमनुगच्छति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
एतैश्चान्यैर्मुनिगणैर्महाभागैर्महात्मभिः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
एतैश्चान्यैश्च कीर्णानि समन्ताज्जलचारिभिः ||
५० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम् |
७० क
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
एतैश्चान्यैश्च वहुभिः सहाय़ैः पाण्डुनन्दनः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
एतैश्चान्यैश्च वहुभिरनुनीतो युधिष्ठिरः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्रह्मो उवाच
एतैश्चान्यैश्च वहुभिर्गुणैर्युक्तान्कथं कपान् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
एतैश्चान्यैश्च वहुभिर्दोषैरेष समन्वितः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
एतैश्चान्यैश्च वहुभिर्नानारूपधरैस्तथा |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
एतैश्चान्यैश्च विप्रस्य हेतुमद्भिः प्रभाषितैः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
एतैश्चान्यैश्च विविधैर्हृष्टतुष्टैरलङ्कृतैः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
एतैश्चापगतैः सर्वैर्व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४४
शकुनिरु उवाच
एतैस्त्वं सहितः सर्वैर्जय़ कृत्स्नां वसुन्धराम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
शल्य उवाच
एतौ च पुरुषव्याघ्रावश्विनाविव सोदरौ |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
एतौ तौ पुरुषव्याघ्रौ रिपुसैन्यं प्रधक्ष्यतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
एतौ द्वौ विवुधश्रेष्ठौ प्रसादक्रोधजौ स्मृतौ |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
एतौ धर्मार्थशास्त्रेषु मोक्षशास्त्रेषु चर्षिभिः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
एतौ पुष्पैः फलै रत्नैस्तोषय़ामि सदा द्विज ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
एतौ मूलं हि दुःखानामस्माकं पुरुषर्षभ |
४५ क
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
एतौ मे परमं व्रह्मन्पिता माता च दैवतम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
एतौ रणे समासाद्य पराश्वस्तः सुय़ोधनः ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
एतौ हि कर्मणा लोकानश्नुवातेऽक्षय़ान्ध्रुवान् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
एतौ हि कर्मणा लोकान्नन्दय़ामासतुर्ध्रुवौ |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
एतौ हि नित्यसंय़ुक्तावितरेतरधारणे |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
एतौ हि परमं धाम कानय़ोराह्निकक्रिय़ा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
द्रुपद उवाच
एतौ हि पुरुषव्याघ्रावेषां प्रिय़हिते रतौ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
एतौ हि वलिनौ शूरौ कृतास्त्रौ जितकाशिनौ |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
एत्य नो नार्जुनो गर्हेद्यथा तात तथा कुरु |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
एतय़ा निहनिष्यामि सव्यसाचिनमाहवे ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
एतय़ा या प्रवृत्तिश्च वृद्ध्यादीन्यांश्च पृच्छसि |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
एतय़ा वर्तमानस्य वुद्ध्या राष्ट्रं न सीदति |
९२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
एतय़ा शुभय़ा वुद्ध्या नैष्ठिकं व्रतमास्थितः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
एतय़ा सङ्ख्यया ह्यासन्कुरुपाण्डवसेनय़ोः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
एतय़ा सततं वृत्त्या चरन्नेवम्प्रकारय़ा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
एतय़ा सततं वृत्त्या चरन्नेवम्प्रकारय़ा |
३७ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
एतय़ा सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः स्वय़म् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
एतय़ोः शरवर्षेण प्रभग्ना नो महारथाः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
एतय़ोपमय़ा धीरः संनमेत वलीय़से |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
एतय़ोपमय़ा धीरः संनमेत वलीय़से |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
एतय़ोरन्तरं पश्य सूक्ष्मय़ोः स्यन्दमानय़ोः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
एतय़ोश्चोभय़ोः स्यातां शुभाशुभतय़ा तथा |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ५०
दुर्योधन उवाच
एधते ज्ञातिषु स वै सद्योवृद्धिर्हि विक्रमः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
एनं क्षेप्स्यामि वृत्रस्य क्षणादेव नशिष्यति ||
३७ ख