शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
भूमावभ्यपतन्राजञ्शरवृष्टिभिरावृताः ||
७४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
भूमावमृद्नन्वेगेन सवर्माणं पताकिनम् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
भूमावश्रूय़त महांस्तदासीत्कृपणं महत् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
भूमावसक्तं दिवि चाप्रमेय़ं; हिरण्मय़ं योऽण्डजमण्डमध्ये |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
भूमावासीन एकाग्रो जगाम मनसा भवम् ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
भूमावासीनमेकान्ते सैरन्ध्र्या समुपस्थितम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
भूमिं केचित्प्रविविशुः पर्वतानपरे तथा |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
भूमिं खं द्यां दिशश्चैव प्राय़ः पश्याम लोहितम् ||
६५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिं तु दत्त्वा साधुभ्यो विन्दते भूमिमेव हि |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
भूमिं भित्त्वा तर्पितं तत्र भीष्मं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा वृक्षादीनण्डजान्पशून् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
भूमिं भूमिशय़ांश्चैव हन्ति काष्ठमय़ोमुखम् |
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिं वृत्तिकरीं दत्त्वा सत्री भवति मानवः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
भूमिं स्पृष्ट्वासृजद्धातून्पृथक्पृथगतीव हि ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
भूमिं स्फीतां दुर्वलत्वादनन्तां; न शक्तस्त्वं रक्षितुं कौरवेय़ ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
भूमिः पञ्चगुणा व्रह्मन्नुदकं च चतुर्गुणम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
भूमिः प्रतिष्ठा भूतानां भूमिरेव पराय़णम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
भूमिः प्रध्वस्तसङ्काशा निर्वृक्षा शुष्ककानना |
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
भूमिचाले यथा वृक्षश्चलत्याकम्पितो भृशम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
भूमिञ्जय़ो वृषक्राथो नैषधश्च महावलः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिदः सर्वभूतेषु शाश्वतीरेधते समाः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
भूमिदानस्य च फलं गोदानस्य च कीर्तितम् ||
६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिदानस्य पुष्पाणि फलं स्वर्गः पुरन्दर ||
८७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
भूमिदानादिभिर्दानैर्यथा पूता भवन्ति वै |
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
भूमिदेवा महाभागाः सदा लोके द्विजातय़ः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
भूमिपर्व ततो ज्ञेय़ं द्वीपविस्तरकीर्तनम् ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
भूमिपानां च सर्वेषां मध्ये वाक्यं जगाद ह ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिपालं च्युतं राष्ट्राद्यस्तु संस्थापय़ेत्पुनः |
७७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
भूमिपालसहस्राणां भूमिः पास्यति शोणितम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
भूमिपालसहस्राणां मध्ये पाण्डुमविन्दत ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
भूमिपालानां च शुश्रूषा कर्तव्या सर्वदस्युभिः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
भूमिपालो यथान्याय़ं वर्तेतानेन धर्मवित् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
भूमिप्रदानं कुर्याद्यः सुरां पीत्वा विमत्सरः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिप्रदानात्पुष्पाणि हिरण्यनिचय़ास्तथा ||
८६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिप्रदानान्नृपतिर्मुच्यते राजकिल्विषात् |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नागभार्यो उवाच
भूमिप्रदानेन गतिं लभत्याश्रमसंमिताम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
भूमिभागास्तथा पुण्या गङ्गाद्वारमथापि च |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिमेते ददुः सर्वे ये भूमिं भुञ्जते जनाः ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
भूमिरल्पफला देय़ा विपरीतस्य भारत ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
भूमिरादिस्तु गन्धानां रसानामाप एव च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वाय़ुराकाशमेव च |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वाय़ुराकाशमेव च |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
भूमिरापस्तथा वाय़ुरग्निराकाशमेव च |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
भूमिरापोऽनलो वाय़ुः खं मनो वुद्धिरेव च |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
सोम उवाच
भूमिरेतौ निगिरति सर्पो विलशय़ानिव |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
भूमिरेतौ निगिरति सर्पो विलशय़ानिव |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
भूमिरेव मनुष्येषु धारणी भूतभाविनी |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
वैशम्पाय़न उवाच
भूमिर्नद्यो नगाः शैलाः सिद्धा देवा महर्षय़ः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
भूमिर्भवति भूतानां सम्यगच्छिद्रदर्शिनी ||
७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
भूमिर्भूतिर्महादेवी दातारं कुरुते प्रिय़म् ||
६ ख